27 जून 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

क्या केएम करियप्पा ने साहस नहीं दिखाया होता तो लेह भारत से अलग हो सकता था?

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
क्या केएम करियप्पा ने साहस नहीं दिखाया होता तो लेह भारत से अलग हो सकता था?

सारांश

क्या आप जानते हैं कि केएम करियप्पा के साहसिक निर्णय ने भारत की भौगोलिक स्थिति को कैसे बदल दिया? यदि उन्होंने सही कदम नहीं उठाए होते, तो आज लेह भारत का हिस्सा नहीं होता। जानिए इस ऐतिहासिक घटना के पीछे की कहानी।

मुख्य बातें

केएम करियप्पा का साहसिक निर्णय भारत की भौगोलिक स्थिति को बदल सकता था।
उन्होंने भारतीय सेना को मिलिट्री इंटेलिजेंस के महत्व को सिखाया।
ऑपरेशन बाइसन ने भारतीय सेना की बहादुरी को उजागर किया।
जोजिला दर्रे का नियंत्रण भारत के लिए आवश्यक था।
यह कहानी हमें प्रेरित करती है कि कैसे एक व्यक्ति का निर्णय राष्ट्र की दिशा मोड़ सकता है।

नई दिल्ली, 27 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के सैन्य इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं, जो केवल युद्ध को ही नहीं, बल्कि देश की भौगोलिक स्थिति को भी परिवर्तित कर देते हैं। केएम करियप्पा द्वारा 1948 में लिया गया एक ऐतिहासिक निर्णय ऐसा ही था, जिसके बिना आज लेह भारत का हिस्सा नहीं होता।

28 जनवरी 1899 को कूर्ग की शांत पहाड़ियों में जन्मे केएम करियप्पा महानता के लिए ही जीवन में आए। ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान नस्लीय बाधाओं को पार करते हुए वे ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होने वाले पहले भारतीयों में से एक बने। 15 जनवरी 1949 को, उन्होंने भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ के रूप में इतिहास रचा, जबकि यह पद पहले केवल अंग्रेजों के लिए था। 1947-48 के जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन्स में उनका नेतृत्व इस क्षेत्र को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण था।

उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने भारतीय सेना को सिखाया कि मिलिट्री इंटेलिजेंस का उपयोग युद्ध के मैदान में लाभ में कैसे किया जा सकता है। लेह जाने वाली सड़क का उद्घाटन तब तक संभव नहीं था जब तक कि भारतीय सेना ने जोजिला, द्रास और कारगिल पर कब्जा नहीं कर लिया। करियप्पा ने आदेशों की अवहेलना करते हुए यह निर्णय लिया।

उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जिसकी दुनिया में कोई मिसाल नहीं थी। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया होता, तो आज लेह भारत का हिस्सा नहीं होता। उनकी योजना के अनुसार, भारतीय सेना ने पहले नौशेरा और झंगर पर कब्जा किया, और फिर जोजिला-द्रास और कारगिल से हमलावरों को पीछे धकेल दिया।

भारत-पाक विभाजन के तुरंत बाद शुरू हुए 1947-48 के भारत-पाक युद्ध ने भारत के लिए एक बड़ी सैन्य परीक्षा प्रस्तुत की। पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों ने जोजिला दर्रे पर कब्जा कर लिया था, जो कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच एकमात्र जीवनरेखा था। यदि यह दर्रा हाथ से निकल गया, तो लेह पूरी तरह से कट जाता और भारत की क्षेत्रीय अखंडता को गहरा नुकसान पहुँचता।

करीब 11,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित जोजिला दर्रा बर्फीले तूफानों, ऑक्सीजन की कमी और बेहद संकरे रास्तों के लिए जाना जाता है। यहां लड़ना असंभव समझा जाता था। न तो भारी हथियार चलाए जा सकते थे और न ही वाहन। पहले किए गए पैदल सेना के हमले में भी असफलता मिली थी। हालात इतने खराब थे कि सैन्य नेतृत्व में भी निराशा फैलने लगी थी।

करियप्पा ने हार मानने से इंकार कर दिया। भारतीय सेना ने जोजिला पर फिर से कब्जा करने के लिए एक साहसी हमला किया, जो ऑपरेशन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इस हमले की खास बात यह थी कि इसमें टैंकों का अचानक इस्तेमाल किया गया, जिससे यह दुनिया में सबसे ऊँचाई पर किया गया पहला ऐसा युद्ध बन गया, जिसमें बख्तरबंद इकाइयां शामिल थीं।

77वीं पैराशूट ब्रिगेड ने इस हमले की शुरुआत की, जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर अटल कर रहे थे। इस हमले का नाम पहले 'ऑपरेशन डक' था, जिसे बाद में करियप्पा ने बदलकर 'ऑपरेशन बाइसन' रखा। अचानक हुए इस हमले से पाकिस्तानी सेनाएं चौंक गईं। भारतीय सेना ने अपने अभियान में आगे बढ़ते हुए दुश्मनों को द्रास तक पीछे धकेल दिया। फिर ब्रिगेड 24 नवंबर को लेह से आगे बढ़ रही भारतीय सेना से जुड़ गई।

करियप्पा के साहसिक कदमों के बाद 'ऑपरेशन बाइसन' की सफलता ने न केवल महत्वपूर्ण क्षेत्र पर फिर से कब्जा किया, बल्कि भारतीय सेना की सरलता और बहादुरी को भी प्रदर्शित किया, जिससे ऊँचाई पर प्रभावी ढंग से काम करने की उनकी क्षमता का पता चला। इस ऑपरेशन की विरासत भारतीय सैन्य कर्मियों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्पष्ट है कि केएम करियप्पा का साहस और नेतृत्व केवल एक सैन्य उपलब्धि नहीं, बल्कि एक देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है। उनकी दूरदर्शिता ने हमारे देश को एक गंभीर संकट से बाहर निकाला और हमें एक मजबूत राष्ट्र के रूप में विकसित होने में मदद की।
RashtraPress
27 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केएम करियप्पा कौन थे?
केएम करियप्पा भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ थे जिन्होंने 1948 में अद्भुत साहस का परिचय दिया।
लेह भारत का हिस्सा कैसे बना?
केएम करियप्पा के साहसिक निर्णयों और रणनीतियों के कारण लेह आज भारत का हिस्सा है।
ऑपरेशन बाइसन क्या था?
ऑपरेशन बाइसन एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान था, जिसका नेतृत्व करियप्पा ने किया, जिसने भारतीय सेना को जोजिला दर्रे पर सफलता दिलाई।
जोजिला दर्रा क्यों महत्वपूर्ण है?
जोजिला दर्रा कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच एकमात्र जीवनरेखा है, और इसका नियंत्रण भारत की क्षेत्रीय अखंडता के लिए आवश्यक है।
भारतीय सेना की बहादुरी का क्या महत्व है?
भारतीय सेना की बहादुरी ने न केवल युद्धों में विजय दिलाई, बल्कि देश की एकता और अखंडता को भी बनाए रखा।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 8 महीने पहले
  2. 8 महीने पहले
  3. 9 महीने पहले
  4. 9 महीने पहले
  5. 10 महीने पहले
  6. 11 महीने पहले
  7. 11 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले