क्या कूथंडावर मंदिर की परंपरा है विवाह के बाद मौत का मातम?
सारांश
Key Takeaways
- कूथंडावर मंदिर की परंपरा अनोखी है, जहाँ विवाह के बाद मातम मनाया जाता है।
- यह किन्नर समुदाय का विशेष उत्सव है, जो १८ दिनों तक चलता है।
- अरावन का बलिदान इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- उत्सव में विभिन्न प्रतियोगिताएँ भी होती हैं।
- यह परंपरा हमें त्याग और कर्तव्य का महत्व सिखाती है।
नई दिल्ली, १ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के हर मंदिर में विभिन्न रहस्यमय कहानियाँ छिपी हुई हैं। भक्त यहाँ अपने दुखों को दूर करने और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करने आते हैं। तमिलनाडु में एक ऐसा मंदिर है, जहाँ पहले विवाह होता है और उसके बाद मौत का मातम मनाया जाता है।
यह मंदिर किन्नरों के देवता के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ किन्नर समुदाय १८ दिनों तक चलने वाले विशेष उत्सव का आयोजन करता है।
तमिलनाडु के कूवगम में स्थित अरावन मंदिर जिसे कूथंडावर मंदिर भी कहा जाता है, अर्जुन के पुत्र अरावन को समर्पित है, जिन्होंने देवताओं के लिए बलिदान दिया था।
इस मंदिर की पौराणिक कथा और अद्वितीय उत्सव के लिए इसे जाना जाता है। यहाँ तमिल माह चिथिरई (अप्रैल-मई) में १८ दिनों तक किन्नरों द्वारा एक अनोखा उत्सव मनाया जाता है। इसमें विभिन्न राज्यों से किन्नर शामिल होते हैं, पहले विवाह करते हैं और फिर अगले दिन मृत्यु का मातम मनाते हैं।
पौराणिक कथा में इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि मां काली की कृपा प्राप्त करने के लिए पांडवों को नरबलि की आवश्यकता थी। अर्जुन के पुत्र अरावन ने स्वेच्छा से बलिदान देने का निर्णय लिया लेकिन उनकी शर्त थी कि वे कुंवारे नहीं मरना चाहते।
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके अरावन से विवाह किया और अगले दिन उनकी मृत्यु पर शोक मनाया। इस बलिदान के कारण किन्नर समाज अरावन को अपना देवता मानता है और एक दिन के लिए विवाह करता है।
१८ दिनों तक चलने वाले उत्सव में किन्नर अरावन से विवाह करते हैं और अगले दिन मंदिर में अपनी चूड़ियाँ तोड़कर शोक मनाते हैं। यह शोक अरावन के प्रति समर्पित होता है, जिन्होंने अपने बलिदान से यह साबित किया कि त्याग और कर्तव्य का क्या महत्व होता है। इस उत्सव में सौंदर्य और गायन जैसी कई रोचक प्रतियोगिताएँ भी होती हैं। किन्नर समुदाय अरावन को अपने मुख्य देवता के रूप में पूजता है, जो त्याग और कर्तव्य के एक सशक्त प्रतीक हैं।