कच्छ की कॉपर बेल शिल्पकला को वैश्विक मंच, अमेरिका-यूके सहित कई देशों में हो रहा निर्यात

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कच्छ की कॉपर बेल शिल्पकला को वैश्विक मंच, अमेरिका-यूके सहित कई देशों में हो रहा निर्यात

सारांश

कच्छ के झुरा गांव की तांबे की घंटियाँ अब सिर्फ पशुओं के गले की शोभा नहीं — ये भारतीय हस्तकला की वैश्विक राजदूत बन चुकी हैं। जीआई टैग और सरकारी योजनाओं की बदौलत 500 से अधिक डिज़ाइन में ढली ये घंटियाँ अमेरिका और ब्रिटेन तक पहुँच रही हैं, और कच्छ के सीमावर्ती गांवों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाई दे रही हैं।

Key Takeaways

  • कच्छ के झुरा गांव की कॉपर बेल हस्तकला को जीआई टैग मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • तांबे की घंटियाँ अब 500 से अधिक अलग-अलग डिज़ाइन में तैयार की जा रही हैं।
  • अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई देशों में इन घंटियों का निर्यात हो रहा है।
  • शिल्पकार जावेद अब्दुल्ला के अनुसार, घंटियाँ 1 नंबर से 13-14 नंबर तक के आकार में बनती हैं; नक्काशी वाली घंटी सबसे महँगी है।
  • मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार की गरवी गुर्जरी जैसी योजनाओं से कारीगरों को नए डिज़ाइन और बाज़ार मिले हैं।
  • यह शिल्पकला ग्रामीण रोज़गार बढ़ाकर कच्छ के सीमावर्ती गांवों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त कर रही है।

गुजरात के कच्छ की सदियों पुरानी कॉपर बेल यानी तांबे की घंटियों की हस्तकला ने अब वैश्विक पहचान हासिल कर ली है। कच्छ के झुरा गांव को इस पारंपरिक शिल्पकला का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहाँ कई पीढ़ियों से कारीगर परिवार इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। जीआई टैग मिलने और सरकारी योजनाओं के सहयोग से यह कला अब अमेरिका और ब्रिटेन सहित अनेक देशों में निर्यात हो रही है।

निर्माण की जटिल प्रक्रिया

कॉपर बेल बनाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और श्रम-साध्य होती है। प्रत्येक घंटी तीन मुख्य हिस्सों — बॉडी, कैप और हैंडल — से मिलकर बनती है। सबसे पहले लोहे की शीट से घंटी का ढाँचा तैयार किया जाता है, फिर उस पर तांबे या पीतल की कोटिंग की जाती है और उसे भट्टी में पकाया जाता है। अंतिम चरण में कारीगर घंटी को विशेष आकार देते हैं और उसमें खास ध्वनि उत्पन्न की जाती है।

कॉपर बेल शिल्पकार अभिषेक लोहार ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में बताया,

Point of View

या सिर्फ निर्यात के आँकड़े चमका रही हैं। झुरा जैसे सीमावर्ती गांवों में पीढ़ियों से चली आ रही यह कला तब और मज़बूत होगी जब मध्यस्थों की भूमिका घटे और कारीगरों को सीधे वैश्विक बाज़ार से जोड़ा जाए। गरवी गुर्जरी जैसी योजनाएँ सही दिशा में हैं, लेकिन 500 डिज़ाइन और अंतरराष्ट्रीय निर्यात के बावजूद जब तक कारीगर परिवारों की वास्तविक आय के आँकड़े सार्वजनिक नहीं होते, यह सफलता अधूरी मानी जाएगी।
NationPress
28/04/2026

Frequently Asked Questions

कच्छ की कॉपर बेल हस्तकला क्या है?
कच्छ की कॉपर बेल हस्तकला गुजरात के झुरा गांव में पीढ़ियों से चली आ रही तांबे और पीतल की घंटियाँ बनाने की परंपरागत शिल्पकला है। इन घंटियों को लोहे के ढाँचे पर तांबे-पीतल की कोटिंग कर भट्टी में पकाकर तैयार किया जाता है और इन्हें जीआई टैग प्राप्त है।
कच्छ की कॉपर बेल को जीआई टैग कब और क्यों मिला?
कच्छ की कॉपर बेल शिल्पकला को जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग मिलने के बाद इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जीआई टैग यह प्रमाणित करता है कि यह विशेष उत्पाद कच्छ क्षेत्र की पारंपरिक विरासत से जुड़ा है और इसकी प्रामाणिकता की गारंटी देता है।
कच्छ की तांबे की घंटियाँ किन देशों में निर्यात हो रही हैं?
कच्छ की कॉपर बेल अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई देशों में निर्यात की जा रही हैं। जीआई टैग और गुजरात सरकार की योजनाओं के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इनकी माँग लगातार बढ़ रही है।
कॉपर बेल कितने प्रकार और आकार में बनाई जाती हैं?
शिल्पकार जावेद अब्दुल्ला के अनुसार, घंटियाँ 1 नंबर से लेकर 13-14 नंबर तक के आकार में बनाई जाती हैं। वर्तमान में ये 500 से अधिक अलग-अलग डिज़ाइन में तैयार हो रही हैं, जिनमें पशुओं के लिए नक्काशी वाली घंटी सबसे महँगी और लोकप्रिय है।
गुजरात सरकार कच्छ की कॉपर बेल कला को बढ़ावा देने के लिए क्या कर रही है?
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने गरवी गुर्जरी जैसी योजनाओं के माध्यम से कारीगरों को नए डिज़ाइन और बाज़ार उपलब्ध कराए हैं। इन प्रयासों से कच्छ के सीमावर्ती गांवों में रोज़गार बढ़ा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था मज़बूत हुई है।
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