कच्छ की कॉपर बेल शिल्पकला को वैश्विक मंच, अमेरिका-यूके सहित कई देशों में हो रहा निर्यात
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के कच्छ की सदियों पुरानी कॉपर बेल यानी तांबे की घंटियों की हस्तकला ने अब वैश्विक पहचान हासिल कर ली है। कच्छ के झुरा गांव को इस पारंपरिक शिल्पकला का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहाँ कई पीढ़ियों से कारीगर परिवार इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। जीआई टैग मिलने और सरकारी योजनाओं के सहयोग से यह कला अब अमेरिका और ब्रिटेन सहित अनेक देशों में निर्यात हो रही है।
निर्माण की जटिल प्रक्रिया
कॉपर बेल बनाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और श्रम-साध्य होती है। प्रत्येक घंटी तीन मुख्य हिस्सों — बॉडी, कैप और हैंडल — से मिलकर बनती है। सबसे पहले लोहे की शीट से घंटी का ढाँचा तैयार किया जाता है, फिर उस पर तांबे या पीतल की कोटिंग की जाती है और उसे भट्टी में पकाया जाता है। अंतिम चरण में कारीगर घंटी को विशेष आकार देते हैं और उसमें खास ध्वनि उत्पन्न की जाती है।
कॉपर बेल शिल्पकार अभिषेक लोहार ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में बताया,