क्या बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के गढ़ 'अररिया' में जदयू-भाजपा की राह मुश्किल होगी?

सारांश
Key Takeaways
- अररिया विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास विविध है।
- 2020 में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 56.3 प्रतिशत थी।
- कृषि इस जिले की आर्थिक रीढ़ है।
- यह जिला भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित है।
- कोई भी पार्टी यहां लगातार दो बार जीत नहीं पाई है।
पटना, 28 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। बिहार के अररिया जिले की अररिया विधानसभा सीट एक महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र है। यह सीट पूर्णिया प्रमंडल के अंतर्गत आती है और इस क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास बेहद रोचक रहा है, जहां कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा और कभी निर्दलीय उम्मीदवार ने अपनी जीत का परचम लहराया है.
वास्तव में, अररिया विधानसभा सीट की क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण चर्चा में रहती है।
अररिया जिला, जो नेपाल की सीमा से सटा है, अपनी विविध संस्कृतिक पृष्ठभूमि और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है। 1951 से 2020 के बीच इस सीट पर 18 चुनाव हो चुके हैं, जिनमें कांग्रेस ने 7 बार (1957, 1967, 1969, 1977, 1985, 2015 और 2020) जीत हासिल की है। इसके बाद निर्दलीय उम्मीदवारों ने 1952, 1962, 1990 और 2000 में चार बार जीत दर्ज की है। भाजपा ने 2005 में दो बार और लोजपा ने 2009 और 2010 में जीत हासिल की है। अन्य दलों ने भी यहां से 1-1 बार जीत दर्ज की है.
हालांकि, इस सीट की खासियत यह है कि कोई भी पार्टी लगातार दो बार जीतने के बाद तीसरी बार जीत नहीं पाई है। भाजपा ने 2005 में (दोनों चुनाव में जीत), लोजपा ने 2009-2010 में और कांग्रेस ने 2015-2020 में लगातार दो-दो बार जीत हासिल की। इस रुझान के अनुसार, 2025 में कांग्रेस के लिए यहां की राह मुश्किल हो सकती है.
2020 विधानसभा चुनाव में यहां मुस्लिम वोटरों का दबदबा था। कांग्रेस के अबिदुर रहमान को 2020 में इस सीट पर 103,054 वोट मिले थे, जो 54.84 प्रतिशत थे। उन्होंने जदयू की उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम को 47,936 वोटों के अंतर से हराया था। हालाँकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां राजद ने बढ़त बनाई, जो 'इंडिया गठबंधन' की मजबूत पकड़ को दर्शाता है.
चुनाव आयोग के अनुसार, 2020 चुनाव में यहां मुस्लिम मतदाता करीब 56.3 प्रतिशत थे, जबकि अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 12.8 प्रतिशत थी। इसके अलावा, युवा वोटर भी यहां निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं.
बिहार की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों में शामिल अररिया की भौगोलिक स्थिति इसे और खास बनाती है। भारत-नेपाल सीमा के पास बसा यह जिला बांग्लादेश और भूटान से भी नजदीकी रखता है। सुवारा, काली, परमार और कोली जैसी नदियां इस क्षेत्र से गुजरती हैं.
इस जिले का नाम भी एक रोचक किस्सा है। कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के जिला कलेक्टर अलेक्जेंडर जॉन फोर्ब्स की कोठी को स्थानीय लोग 'रेसिडेंशियल एरिया' या 'आर-एरिया' कहते थे, जो समय के साथ 'अररिया' बन गया.
कृषि इस जिले की आर्थिक रीढ़ है। धान, मक्का, जूट, गन्ना और सब्जियां (बैंगन, टमाटर, मिर्च) यहां की उपजाऊ मिट्टी में अच्छी तरह उगती हैं। हालाँकि, अनुकूल जलवायु और मिट्टी के बावजूद औद्योगिक विकास नगण्य है। स्थानीय बाजार और छोटे उद्योग ही लोगों की आजीविका का सहारा हैं। इस जिले की सबसे बड़ी समस्या इसकी पिछड़ी स्थिति है, जिसके कारण यहां आवश्यक सुविधाओं का अभाव है.