क्या ‘लोकभवन’ सरकार और जनता के बीच एक मजबूत सेतु बनेगा? : राज्यपाल आचार्य देवव्रत
सारांश
Key Takeaways
- राजभवनों का नाम बदलकर लोकभवन किया गया।
- यह निर्णय जन-केंद्रितता को बढ़ावा देने के लिए है।
- लोकभवन अब सामाजिक संवाद का केंद्र बनेगा।
- यह सरकार की जिम्मेदारी को दर्शाता है।
- राज्यपाल का यह कदम लोककल्याण के प्रति समर्पित है।
मुंबई, २ दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार ने देशभर के राजभवनों के नाम बदलकर लोकभवन कर दिया है। इस संदर्भ में महाराष्ट्र राजभवन का नाम अब आधिकारिक रूप से ‘महाराष्ट्र लोकभवन’ कर दिया गया है।
महाराष्ट्र और गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने इस संबंध में राजभवन सचिवालय को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।
राज्यपाल ने कहा कि यह निर्णय लोकभवन को अधिक जन-केंद्रित, पारदर्शी और लोककल्याण हेतु पूर्णतः समर्पित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक कदम है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि ‘लोक भवन’ के रूप में जाना जाने वाला यह भवन अब केवल राज्यपाल के निवास और कार्यालय तक सीमित न रहकर, राज्य के नागरिकों, समाज के विभिन्न वर्गों, छात्रों, शोधकर्ताओं, किसानों और नागरिक संगठनों के साथ संवाद, सहयोग और सहभागिता का एक जीवंत केंद्र बने।
राज्यपाल ने यह भी कहा कि ‘लोकभवन’ का नामकरण इस उद्देश्य को प्रतिबिंबित करता है कि यह भवन सरकार और राज्य की जनता के बीच सेवा, सहयोग और संवाद का एक मजबूत सेतु बने।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लोक भवन संवैधानिक दायित्वों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समाज की आशाओं, आकांक्षाओं और समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहकर जनता से सीधा और सार्थक संबंध बनाए रखेगा, तभी यह अपने वास्तविक अर्थ में ‘लोकभवन’ कहलाएगा।
भारत में १ दिसंबर २०२५ की तारीख इतिहास में दर्ज हो गई है, क्योंकि इस दिन देशभर में सभी राज्यों के राजभवन के नामों को बदल दिया गया। अब विभिन्न राज्यों के राजभवन को लोकभवन नाम दिया गया है।
इस क्रम में केंद्र सरकार की तरफ से राजभवनों का नाम बदलना स्पष्ट संदेश है कि सत्ता कोई लाभ उठाने का माध्यम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का नाम है। नाम बदलने के पीछे केवल दिखावा भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक स्पष्ट संदेश और सोच छिपी हुई है। संदेश यह है कि सरकार का काम जनता की सेवा करना है, ना कि सत्ता का सुख भोगना।