क्या राहुल की इनसिक्योरिटी प्रियंका को आगे नहीं आने दे रही है? : शकील अहमद
सारांश
Key Takeaways
- शकील अहमद ने पार्टी की असफलताओं के पीछे राहुल गांधी की इनसिक्योरिटी को बताया।
- प्रियंका गांधी का जन संपर्क और भाषण प्रभावी हैं।
- कांग्रेस के भीतर परिवार-केंद्रित निर्णयों का प्रभाव है।
- पार्टी के नेतृत्व को लेकर संदेह का माहौल है।
- राहुल और प्रियंका की राजनीतिक रणनीतियों में अंतर है।
नई दिल्ली, 25 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। कांग्रेस के पूर्व नेता डॉ. शकील अहमद ने रविवार को राष्ट्र प्रेस से बातचीत में पार्टी की लगातार चुनावी असफलता, राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और प्रियंका गांधी की संभावित भूमिका पर खुलकर चर्चा की।
शकील अहमद ने पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे नेतृत्व की कार्यशैली, आंतरिक इनसिक्योरिटी और परिवार-केंद्रित निर्णयों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे राहुल गांधी के आलोचक नहीं हैं, लेकिन पार्टी की भलाई के लिए सच्चाई बताना आवश्यक है।
शकील अहमद ने कहा, "सोनिया गांधी ने राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और सीताराम केशरी जैसे विभिन्न गुटों वाली कांग्रेस को एकजुट कर एक मजबूत 'सोनिया गांधी की कांग्रेस' स्थापित की और पार्टी को संकट से उबारकर नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, लेकिन राहुल गांधी इस कांग्रेस को भी अपना नहीं बना सके।"
उन्होंने आगे कहा, "हम राहुल गांधी के विरोधी नहीं हैं। मैंने उनके साथ काफी समय बिताया और उनसे कई बातें कीं। जहां गलती नजर आती थी, मैं उन्हें टोकता था कि यह नहीं करना चाहिए। मुझे लगता था कि कांग्रेस की भलाई देश की भलाई है, लेकिन शायद राहुल को ठेस पहुंची, और मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी।"
शकील अहमद ने राहुल गांधी को स्पष्ट रूप से ‘एरोगेंट’ (अहंकारी) बताया। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि शशि थरूर खड़े हुए थे, वे उन्हें वोट देना चाहते थे, लेकिन सोनिया-राहुल ने मल्लिकार्जुन खड़गे को आधिकारिक उम्मीदवार बनाया, इसलिए वोट बर्बाद न हो, इसीलिए खड़गे को वोट दिया। खड़गे अब भी कहते हैं कि राहुल-सोनिया ने उन्हें अध्यक्ष बनाया।
उन्होंने कहा, "जब सोनिया, राहुल और प्रियंका एक साथ होते हैं, तो नेहरू-गांधी परिवार जो चाहेगा, वही अध्यक्ष होगा। अन्य नेताओं में यह संशय रहता है कि क्या करना चाहिए।"
प्रियंका गांधी पर शकील ने कहा कि उनका ज्यादा संपर्क नहीं रहा, लेकिन उनकी स्पीच जनता से सबसे अधिक जुड़ती है। उनके भाषण में भारतीयता का बोध है। सोनिया ने संस्कृति निभाई, लेकिन प्रियंका यहां की पैदाइश हैं, इसलिए वे ज्यादा सटीक और प्रभावी बोलती हैं।
वे मानते हैं कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार पर विश्वास है, और नेतृत्व का निर्णय परिवार का है, लेकिन कई नेता कहते हैं कि राहुल की इनसिक्योरिटी के कारण प्रियंका को आगे नहीं लाया जा रहा है। 30-32 साल राजनीति के बाद सांसद बनीं, महासचिव रहीं, लेकिन कोई बड़ा राज्य प्रभार नहीं मिला। यूपी हारने के बाद असम जैसे छोटे राज्य का सचिव बनाया गया, ताकि वे फ्रंटलाइन पर न आएं। पार्टी असफल होती रही, लेकिन चेहरा राहुल ही रहा।
शकील ने कहा, "राहुल ही पार्टी के मालिक हैं। प्रियंका फ्रंट में आना चाहती हैं या भाई के पीछे रहकर काम करना चाहती हैं, यह अंदर की बात है। दोनों में बहुत प्रेम दिखता है। बाहर से प्रियंका का जन-कनेक्शन और भाषण किसी से बेहतर है।"