क्या लखनऊ में राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव के साथ भीड़ ने कुलपति कार्यालय में तोड़फोड़ की?
सारांश
Key Takeaways
- महिला सम्मान और कानून का पालन महत्वपूर्ण हैं।
- प्रशासनिक सूचना का पालन आवश्यक है।
- जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता होनी चाहिए।
- घटनाओं का पारदर्शिता से सामना करना चाहिए।
- कठोरतम कार्रवाई का प्रतिबद्धता आवश्यक है।
लखनऊ, 9 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) ने यह स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय के परिसर में हाल में हुई घटनाओं के सभी तथ्यों को पूरी पारदर्शिता से प्रस्तुत करना आवश्यक है। कथित यौन उत्पीड़न के गंभीर प्रकरण की जांच विशाखा समिति ने पूरी निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया के तहत की। समिति की रिपोर्ट 15 दिनों में मिलने के बाद प्रशासन ने मीडिया के सामने तथ्यों को प्रस्तुत करना अपनी जिम्मेदारी समझा, ताकि कोई भ्रामक जानकारी न फैले। इस उद्देश्य से विश्वविद्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया।
यह प्रेस कॉन्फ्रेंस कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद के नेतृत्व में हुई। इसमें विशाखा समिति की अध्यक्ष डॉ. मोनिका कोहली, कुलानुशासक डॉ. आर. ए. एस. कुशवाहा, शिक्षक संघ अध्यक्ष एवं मीडिया सेल प्रभारी डॉ. के. के. सिंह, सह प्रभारी डॉ. प्रेमराज सिंह और डॉ. अमिय अग्रवाल के साथ नर्सिंग संघ, कर्मचारी संघ और छात्र संघ के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। सभी वक्ताओं ने एकमत होकर कहा कि विश्वविद्यालय इस मामले को केवल आंतरिक मुद्दा नहीं, बल्कि महिला सम्मान, नैतिकता और कानून के पालन से जुड़ा बहुत गंभीर मामला मानता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि विशाखा समिति ने सभी साक्ष्यों, संबंधित पक्षों के बयानों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए आरोपी को दोषी पाया है। समिति ने विश्वविद्यालय के इतिहास में अब तक की सबसे सख्त सिफारिश की है और आरोपी का दाखिला रद्द करने का प्रस्ताव चिकित्सा शिक्षा निदेशालय को भेजने का निर्णय लिया है। मीडिया प्रतिनिधियों ने इस जानकारी पर संतोष व्यक्त किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस शांतिपूर्ण माहौल में समाप्त हुई और सभी सवालों के जवाब तथ्यों के साथ दिए गए।
दुर्भाग्य से प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के तुरंत बाद कुलपति कार्यालय के बाहर अचानक भीड़ जमा हो गई। बाद में पता चला कि राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव बिना किसी पूर्व सूचना के विश्वविद्यालय परिसर में प्रेस संबोधन या मुलाकात के लिए पहुंची थीं। न तो प्रशासन को और न ही स्थानीय पुलिस को इसकी कोई जानकारी दी गई थी।
फिर भी कुलपति के निर्देश पर संस्थागत शिष्टाचार और संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए उनके स्वागत की व्यवस्था की गई। समन्वय के लिए एक अतिरिक्त प्रॉक्टर नियुक्त किया गया और उपकुलपति, कुलानुशासक तथा विशाखा समिति की अध्यक्ष उन्हें जानकारी देने के लिए तैयार रहीं। अपर्णा यादव से अनुरोध किया गया कि वे अंदर आकर कुलपति से मिलें, लेकिन उन्होंने अकेले मिलने से इनकार कर दिया और अपने साथ लाई करीब 200 लोगों की भीड़ के साथ ही मिलने पर अड़ गईं।
धीरे-धीरे भीड़ उग्र हो गई और स्थिति बेकाबू होने लगी। प्रदर्शनकारियों ने जबरन दरवाजे तोड़कर कुलपति कार्यालय में घुस गए, प्रशासनिक कक्षों पर कब्जा कर लिया और तोड़फोड़ व नारेबाजी शुरू कर दी। उस समय कुलपति प्रोन्नति समिति के साक्षात्कार में व्यस्त थीं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन, सुरक्षा कर्मियों और अधिकारियों ने सूझबूझ दिखाई और कुलपति को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, ताकि उन्हें कोई शारीरिक चोट न पहुंचे और मामला और बिगड़े नहीं।
तुरंत इस घटना की सूचना राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री के कार्यालयों को दी गई। निर्देश मिलते ही पुलिस बल मौके पर पहुंचा और करीब एक घंटे के प्रयास से स्थिति काबू में आई। इस अराजकता से विश्वविद्यालय की नियमित गतिविधियां प्रभावित हुईं। उसी भवन में प्रोमोशन कमेटी के साक्षात्कार चल रहे थे और ऊपरी तल पर एमबीबीएस की परीक्षाएं हो रही थीं, जिन्हें रोकना पड़ा। विश्वविद्यालय ने दो मुख्य बातों पर जोर दिया। पहली, अगर अपर्णा यादव को विशाखा समिति की रिपोर्ट पर चर्चा करनी थी, तो संवैधानिक पद पर रहते हुए पूर्व सूचना क्यों नहीं दी गई, जबकि कुलपति अपने दायित्व निभा रही थीं। दूसरी, अगर गंभीर चर्चा का उद्देश्य था, तो 200 लोगों की भीड़ साथ लाने की क्या जरूरत थी। केजीएमयू ने दोहराया कि वह दोषियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है, साथ ही संस्थान की गरिमा, शांति, कानून व्यवस्था, शैक्षणिक माहौल और रोगी सेवाओं की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।