इस्लाम महिलाओं को समानता और न्याय का अधिकार प्रदान करता है: मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन
सारांश
Key Takeaways
- महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है।
- इस विधेयक से समानता और न्याय प्रदान होगा।
- इस्लाम ने महिलाओं को समानता का अधिकार दिया है।
अलीगढ़, 16 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। महिला आरक्षण विधेयक के संबंध में संसद का विशेष सत्र गुरुवार से शुरू हो चुका है। तीन दिन तक चलने वाले इस सत्र को लेकर समाज के आधे हिस्से में खुशी की लहर है, वहीं कुछ राजनीतिक दल इस सत्र का विरोध कर रहे हैं।
मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने इस सत्र को महिलाओं के हक में सकारात्मक बताते हुए कहा कि इस विधेयक को पारित होना चाहिए, कानून बनना चाहिए और आधी आबादी को उनके अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग इस विधेयक के कानून में तब्दील होने का विरोध कर रहे हैं, वे महिलाएं की राजनीति में भागीदारी बढ़ने के खिलाफ हैं।
मौलाना ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि यह विधेयक महिलाओं की छवि को बदलने वाला है। वर्तमान में महिलाओं पर अन्याय और अत्याचार हो रहा है। इस विधेयक के माध्यम से महिलाओं को न्याय मिलेगा।
उन्होंने आगे कहा कि यह विधेयक समानता, न्याय, सामाजिक न्याय और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बहुत से लोग और नेता महिलाओं के पक्ष में बोलते हैं, लेकिन जब कानून बनता है और महिलाओं को उनके अधिकार कानूनी रूप से दिए जाते हैं, तब ही मुद्दा उठता है।
मौलाना ने कुछ इस्लामी धार्मिक नेताओं के उस दृष्टिकोण पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें कहा गया है कि इस्लाम में महिलाओं को केवल घर-परिवार की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने कहा कि यह दृष्टिकोण इस्लाम के खिलाफ है।
इस्लाम ने महिलाओं को समानता का अधिकार दिया है। सलाह-मशवरे में उन्हें बराबर का दर्जा दिया गया है और समाज सेवा में भी समानता दी गई है। महिलाओं का बहिष्कार नहीं किया गया है।
मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने कहा कि इस्लाम में ऐसी कोई बात नहीं है जो महिलाओं के साथ अन्याय या जुल्म को बढ़ावा देती है। इस्लाम अन्याय को एक गंभीर अपराध मानता है और जुल्म को बहुत बड़ा पाप बताता है, इसलिए इस्लाम समानता, न्याय और सामाजिक सेवा का आदेश देता है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के हित में महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन किया जाना चाहिए।