क्या सनातन दर्शन एकात्म मानव दर्शन है? - मोहन भागवत

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क्या सनातन दर्शन एकात्म मानव दर्शन है? - मोहन भागवत

सारांश

मोहन भागवत ने दीनदयाल उपाध्याय के योगदान पर चर्चा की और बताया कि कैसे सनातन दर्शन को एकात्म मानव दर्शन में बदला गया। इस विचारधारा की वैश्विक प्रासंगिकता और भारतीय संस्कृति की विविधता के बारे में महत्वपूर्ण बातें साझा की गई हैं। इस लेख में जानें कि एकात्म मानव दर्शन क्या है और यह आज के युग में कैसे महत्वपूर्ण है।

मुख्य बातें

एकात्म मानव दर्शन का उद्देश्य सभी मानवता को एकजुट करना है।
यह दर्शन धर्म को संप्रदाय से ऊपर उठाता है।
मोहन भागवत का मानना है कि भारतीयों ने विदेशों में सकारात्मक योगदान दिया है।

जयपुर, 15 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देश, काल और परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अनुसार सनातन दर्शन को एकात्म मानव दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया, जो आधुनिक विश्व के लिए महत्वपूर्ण है।

उन्होंने बताया कि यह दर्शन औपचारिक रूप से 60 वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया गया था, लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी विश्व में बनी हुई है। भागवत जयपुर में एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि एकात्म मानव दर्शन का सार एक शब्द में समझा जा सकता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ केवल संप्रदाय या पंथ नहीं है, बल्कि यह एक लक्ष्य और एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण है जो सभी को समाहित करता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में विश्व को इस दर्शन को अपनाना चाहिए। उन्होंने ऐतिहासिकता का हवाला देते हुए कहा कि भारतीयों ने कभी भी विदेश यात्रा के दौरान दूसरों का शोषण नहीं किया है, बल्कि सकारात्मक योगदान दिया है।

भागवत ने कहा कि भारत में जीवनशैली, खान-पान और पहनावे में बदलाव आया है, फिर भी एकात्म मानववाद का शाश्वत दर्शन अक्षुण्ण है। उन्होंने कहा कि सुख खुद के भीतर निहित है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि इस आंतरिक आनंद को पहचानने से यह समझ विकसित होती है कि पूरा विश्व एक है। एकात्म मानववाद अतिवाद से मुक्त दर्शन है।

भागवत ने शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शक्ति के बारे में बात करते हुए कहा कि सभी शक्तियों की सीमाएं होती हैं।

उन्होंने आगे कहा कि समय की मांग है कि सभी के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध रहते हुए व्यक्तिगत विकास किया जाए। उन्होंने वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल का हवाला देते हुए कहा कि भारत अपेक्षाकृत कम प्रभावित होता है, क्योंकि इसकी आर्थिक ताकत पारिवारिक संरचना में निहित है।

भागवत ने तेज वैज्ञानिक प्रगति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भौतिक सुख-सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन शांति और संतोष में कमी आई है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नई दवाओं के बावजूद स्वास्थ्य में सचमुच सुधार हुआ है, और बताया कि कुछ बीमारियां विशेष इलाज के कारण होती हैं।

उन्होंने कहा कि वैश्विक आबादी का केवल 4 प्रतिशत ही दुनिया के 80 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग करता है, जिससे विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा विविधता रही है, लेकिन यह संघर्ष का स्रोत नहीं रहा, बल्कि उत्सव का स्रोत रहा है।

भारतीय समाज ने अनगिनत देवताओं को स्थान दिया है और बिना किसी कठिनाई के और अधिक देवताओं का स्वागत करता है। दुनिया तन, मन और बुद्धि के सुख के अस्तित्व को तो मानती है, लेकिन इन तीनों को एक साथ कैसे प्राप्त किया जाए, यह नहीं जानती।

भागवत ने आगे कहा कि भारत इसे विशिष्ट रूप से समझता है क्योंकि वह तन, मन, बुद्धि और आत्मा के समग्र सुख में विश्वास करता है।

इससे पहले, एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष महेश शर्मा ने कार्यक्रम का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि पूरा ब्रह्मांड आपस में जुड़ा हुआ है और एक कण की गति भी समग्र ब्रह्मांड पर प्रभाव डालती है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष वंदे मातरम की रचना की 150वीं वर्षगांठ है और वर्तमान परिस्थितियों में पूरा गीत गाने के महत्व पर बल दिया।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें मोहन भागवत का विचार है कि एकात्म मानव दर्शन का सार सभी को एकजुट करने में निहित है। इसे अपनाकर हम वैश्विक समरसता की ओर बढ़ सकते हैं। यह विचारधारा न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान करती है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक बनाती है।
RashtraPress
21 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकात्म मानव दर्शन क्या है?
एकात्म मानव दर्शन एक ऐसा दर्शन है जो सभी मानवता को एकजुट करने की बात करता है। यह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समरसता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मोहन भागवत ने इस पर क्या कहा?
मोहन भागवत ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इसे आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुसार प्रस्तुत किया है, जो आज भी प्रासंगिक है।
भारत की संस्कृति में विविधता का क्या महत्व है?
भारत की संस्कृति में विविधता एक उत्सव का रूप लेती है, जो सभी को एक साथ लाने का कार्य करती है।
राष्ट्र प्रेस
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