मौनी अमावस्या: क्या यह ईश्वर और पितरों की आराधना का विशेष दिन है?
सारांश
Key Takeaways
- मौनी अमावस्या का महत्व ईश्वर और पितरों की आराधना में है।
- इस दिन दान-पुण्य करना विशेष फलदायी है।
- मौन व्रत से मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति होती है।
- पितृदोष निवारण के लिए तर्पण और श्राद्ध का महत्व है।
- प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में स्नान का विशेष महत्व है।
नई दिल्ली, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। माघ मास की अमावस्या तिथि को मौनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है, जो हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और मौन व्रत का पालन करते हैं। यह दिन ईश्वर और पूर्वजों की पूजा के लिए विशेष महत्व रखता है। पंचांग के अनुसार, मौनी अमावस्या 18 जनवरी को है।
मौन रहना एक महत्वपूर्ण तप माना जाता है, जिससे मन में शांति आती है, विचारों में संयम रहता है और आत्म-चिंतन होता है। मान्यता है कि मौन से वाणी की शुद्धि होती है, पापों का नाश होता है, और आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, स्वास्थ्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह व्रत पूर्वजों की कृपा और पितृदोष निवारण के लिए फलदायी है।
पंचांग के अनुसार, 18 जनवरी को मौनी अमावस्या रात 1:21 बजे से शुरू होकर 19 जनवरी तक रहेगी। इस दिन का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि यह रविवार को आता है। सूर्योदय 7:15 बजे और सूर्यास्त 5:49 बजे होगा। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र सुबह 10:14 बजे तक रहेगा, इसके बाद उत्तराषाढ़ा का आरंभ होगा। हर्षण योग शाम 9:11 बजे तक रहेगा और करण चतुष्पाद दोपहर 12:45 बजे तक। राहुकाल दोपहर 4:29 से 5:49 बजे तक रहेगा, इस दौरान कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मौनी अमावस्या पर मौन रहकर साधना, पूजा और ध्यान करना विशेष फलदायी होता है। इस दिन देवता और पूर्वज धरती पर आते हैं। मौन व्रत के साथ किया गया स्नान, दान और पूजा पूर्वजों को प्रसन्न करती है। इससे पितृदोष दूर होता है, पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है। माघ मास की यह अमावस्या प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में स्नान के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है, जहां लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। यह दिन आत्मिक शुद्धि, पाप मुक्ति और मोक्ष का भी अवसर है।
मौनी अमावस्या पर दान-पुण्य और पूजा-पाठ का विशेष महत्व है। इस दिन संभव हो सके तो नदी में स्नान करना चाहिए; अगर आपके घर के पास नदी नहीं है, तो त्रिवेणी का ध्यान करके घर में स्नान करें। मौन रहकर ध्यान और ईश्वर की आराधना करें। पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करें और उन्हें काले तिल, कुश और जल से दक्षिण दिशा की ओर अर्घ्य दें। पीपल के वृक्ष की पूजा और परिक्रमा का भी विधान है।
मौनी अमावस्या पर मौन साधना, स्नान-दान और पितृ पूजा से जीवन में नकारात्मकता दूर होती है और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दान-पुण्य कई गुना फल देता है। अपनी सामर्थ्य अनुसार काले तिल, गुड़, घी, अन्न, चावल, आटा, गर्म कपड़े, पका हुआ भोजन, फल, धन दान करना चाहिए। गरीबों, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराना भी पुण्य का काम है। यह दान गुप्त रूप से करना उत्तम माना जाता है। भगवान विष्णु और शिव की पूजा भी करें।