क्या बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी की संभावनाओं पर संगोष्ठी का समापन हुआ?

Click to start listening
क्या बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी की संभावनाओं पर संगोष्ठी का समापन हुआ?

सारांश

नालंदा विश्वविद्यालय में संपन्न हुई संगोष्ठी ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए आवश्यक रणनीतियों पर जोर दिया। इस महत्वपूर्ण चर्चा ने नालंदा को वैश्विक संवाद का केंद्र बनाया है। जानिए, क्या हैं हिंदी की भविष्य की संभावनाएं!

Key Takeaways

  • हिंदी की वैश्विक उपस्थिति को सशक्त बनाने के लिए साझा भागीदारी आवश्यक है।
  • संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की भूमिका को मान्यता दिलाने के लिए दीर्घकालीन रणनीति जरूरी है।
  • शैक्षणिक और शोध आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

राजगीर, 10 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। बिहार के नालंदा जिले में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में शनिवार को 'हिंदी के संवर्धन और वैश्विक संवाद' विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन किया गया। इस संगोष्ठी में नालंदा को संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की भूमिका और संभावनाओं पर एक महत्वपूर्ण वैश्विक विमर्श के मुख्य अकादमिक मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया।

समापन दिवस पर आयोजित पंचम सत्र “उच्च शिक्षण संस्थानों का योगदान” और षष्ठ सत्र “हिंदी सेवियों का योगदान” में यह बात स्पष्ट की गई कि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों की साझा भागीदारी के बिना हिंदी को वैश्विक स्तर पर सशक्त बनाना संभव नहीं है।

अंतिम अकादमिक सत्र “संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी: एक प्रस्तावित मार्ग” पर केंद्रित रहा, जिसे पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस, प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र ने प्रस्तुत किया और लिस्बन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शिव कुमार सिंह ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में स्थापित करने के पक्ष में अपने विचार रखे।

इस सत्र में संयुक्त राष्ट्र की भाषा नीति के ऐतिहासिक विकास - 1945 में पांच भाषाओं की स्वीकृति और 1973 में अरबी भाषा के समावेश - पर चर्चा की गई। यह रेखांकित किया गया कि किसी भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए दीर्घकालीन कूटनीति, वित्तीय सहयोग और बहुपक्षीय समर्थन आवश्यक होते हैं। अरबी भाषा का अनुभव हिंदी के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

विमर्श में हिंदी की वैश्विक उपस्थिति, विशाल भाषी समुदाय, तकनीक और इंटरनेट के माध्यम से बढ़ते प्रसार और ‘हिंदी ऐट यू एन’ पहल के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की वास्तविक उपस्थिति को महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में बताया गया।

इस अवसर पर नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी केवल भाषायी गौरव का सवाल नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यतागत उपस्थिति और बौद्धिक आत्मविश्वास की प्रगति का प्रतीक है।"

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संस्थागत तैयारी और दीर्घकालीन रणनीति अनिवार्य है। वैश्विक परिदृश्य में उभरते ‘ग्लोबल साउथ’ के महत्व के साथ यह प्रस्ताव और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। सत्र के दौरान, नालंदा विश्वविद्यालय और केंद्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनाथ के बीच शैक्षणिक और शोध आदान–प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

यह साझेदारी ज्ञान–परंपराओं के संवाद, अंतर्विषयक शोध और अकादमिक सहयोग को नई दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Point of View

यह संगोष्ठी न केवल हिंदी भाषा के विकास के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वैश्विक संवाद में भारत की भूमिका को भी उजागर करती है। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए आवश्यक है कि हम इसे एक सशक्त मंच प्रदान करें।
NationPress
11/01/2026

Frequently Asked Questions

इस संगोष्ठी में कौन से प्रमुख विषयों पर चर्चा की गई?
संगोष्ठी में हिंदी के संवर्धन, उच्च शिक्षण संस्थानों का योगदान और हिंदी सेवियों का योगदान जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
क्या हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए कोई रणनीति प्रस्तावित की गई?
जी हां, संगोष्ठी में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए दीर्घकालीन कूटनीति और वित्तीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
Nation Press