क्या जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे?

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क्या जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे?

सारांश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू के विचारों को याद करते हुए कहा कि वे सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे। इस लेख में जानिए कि कैसे सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस ऐतिहासिक कार्य को संभव बनाया। यह कहानी भारतीय संस्कृति और उसके मूल्यों की एक महत्वपूर्ण झलक पेश करती है।

Key Takeaways

  • नेहरू का मानना था कि सरकारी हस्तक्षेप से भारत की छवि प्रभावित होगी।
  • सरदार पटेल की यात्रा ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।
  • सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन 1951 में हुआ, जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भाग लिया।

नई दिल्ली, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक प्राचीन प्रसंग को याद किया। उन्होंने कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए उत्सुक नहीं थे। उनका मानना था कि सरकार और उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को इस कार्य में नहीं आना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ब्लॉग में उल्लेख किया कि स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी सरदार वल्लभभाई पटेल पर आई। यह वही मंदिर है, जिस पर 1026 में आक्रमण हुआ था। उन्होंने कहा कि दीपावली 1947 में जब सरदार पटेल सोमनाथ पहुंचे, तो वहां की स्थिति उन्हें गहराई से प्रभावित कर गई। इसी यात्रा के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खोला गया। उस समय देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि सरकार इस मंदिर के पुनर्निर्माण से औपचारिक रूप से न जुड़े। वे राष्ट्रपति और मंत्रियों की उपस्थिति पर भी आपत्ति व्यक्त करते थे। नेहरू का मानना था कि इससे भारत की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने निर्णय पर कायम रहते हुए समारोह में भाग लिया।

प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि दुर्भाग्य से सरदार पटेल इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना देश के समक्ष साकार हो चुका था। उन्होंने कहा, "तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना को लेकर अधिक उत्साहित नहीं थे। वे नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इससे भारत की छवि प्रभावित होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू ने अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।"

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सोमनाथ मंदिर पर के.एम. मुंशी का जिक्र किए बिना बात अधूरी है। उन्होंने सरदार पटेल का पूरा समर्थन किया। मुंशी की पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’ को प्रधानमंत्री ने बहुत ज्ञानवर्धक बताया और कहा कि इसका नाम ही भारत की सभ्यता की सोच को दर्शाता है, जिसमें आत्मा और विचारों की अमरता पर विश्वास किया जाता है।

उन्होंने कहा, "हम मानते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही। यही विचार हमें हर काल में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प के कारण आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास के नजरिए से देख रही है। वे हमारे नवोन्मेषी युवाओं में निवेश करना चाहती हैं। हमारी कला, संस्कृति, संगीत और अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

Point of View

यह घटना भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है। यह दर्शाता है कि कैसे विचारधाराएँ और नेतृत्व एक राष्ट्र के सांस्कृतिक धरोहर को आकार देते हैं। इस संदर्भ में, हमें हमारे इतिहास को समझना और उसके मूल्यों को अपनाना चाहिए।
NationPress
07/01/2026

Frequently Asked Questions

क्या नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के खिलाफ थे?
हाँ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, पंडित जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे।
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कब हुआ?
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण 11 मई 1951 को हुआ था।
सरदार पटेल का इस पुनर्निर्माण में क्या योगदान था?
सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी ली और उनकी यात्रा इस निर्णय के लिए प्रेरणादायक थी।
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