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क्या असंतुलन आज के वैश्विक संकटों का मूल कारण है: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत?

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क्या असंतुलन आज के वैश्विक संकटों का मूल कारण है: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत?

सारांश

आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने असंतुलन को वैश्विक संकटों का मुख्य कारण बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नैतिकता और धर्म का प्रसार आवश्यक है, जो केवल आचरण के माध्यम से संभव है। जानिए इस विषय पर उनके विचार और भारतीय परंपरा की भूमिका।

मुख्य बातें

असंतुलन धर्म और नैतिकता का प्रसार अनुकरणीय आचरण का महत्व स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन भारतीय संस्कृति में सह-अस्तित्व

जयपुर, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को यह कहा कि भारत का ऐतिहासिक और नैतिक दायित्व है कि वह विश्व में धर्म और नैतिक मूल्यों का प्रसार करे। यह कार्य केवल भाषणों या पुस्तकों से नहीं, बल्कि अनुकरणीय आचरण के माध्यम से ही संभव है।

भागवत राजस्थान के दीदवाना-कुचामन जिले के छोटीखाटू में आयोजित 162वें 'मर्यादा महोत्सव' को संबोधित कर रहे थे।

इस कार्यक्रम में जैन श्वेतांबर तेरापंथ संप्रदाय के 11वें आचार्य, आचार्य महाश्रमण की उपस्थिति में कई श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता में सत्य और धर्म केवल विचारधाराएं नहीं हैं, बल्कि यह एक जीवन शैली हैं, जो भारतीय लोकाचार को विश्व स्तर पर अद्वितीय बनाती हैं।

भागवत ने यह भी कहा कि आज दुनिया में जो संघर्ष और सामाजिक विखंडन देखा जा रहा है, उसका समाधान केवल प्रौद्योगिकी, पूंजी या सैन्य शक्ति से नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि विश्व को एक ऐसे नैतिक ढांचे की आवश्यकता है जो धार्मिकता के भीतर मानवीय व्यवहार को मार्गदर्शन दे सके। भारत में यह दृष्टि है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि शाश्वत सत्य समय और परिस्थितियों से परे है, लेकिन इसके अनुप्रयोग को बदलते युगों के साथ विकसित होना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी विचार की प्रासंगिकता तब स्थापित होती है जब समाज के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति उस पर अमल करते हैं।

उन्होंने बताया कि लोग उपदेशों से नहीं, बल्कि आचरण से प्रेरित होते हैं, इसीलिए अनुशासित, नैतिक और आध्यात्मिक जीवन जीने वालों को परंपरागत रूप से आदर्श माना गया है।

विकास और पर्यावरण पर चर्चा करते हुए भागवत ने कहा कि असंतुलन आज के वैश्विक संकटों का मुख्य कारण है।

उन्होंने कहा कि अनियंत्रित विकास की दौड़ ने प्रकृति और मानवता के संबंध को कमजोर कर दिया है।

भारतीय परंपरा सह-अस्तित्व और संतुलन का पाठ पढ़ाती है। संघर्ष नहीं, सामंजस्य स्थायी समाधान प्रदान करता है, और यह दृष्टिकोण आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

उन्होंने आगे कहा कि भौतिक प्रगति आवश्यक है, लेकिन यह जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारतीय चिंतन में धन एक साधन है, लक्ष्य नहीं। इसी कारण भारतीय समाज में दान, सेवा और परोपकार की भावना स्थायी है।

उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन का मूल विश्वास यह है कि दृश्य विविधता के बावजूद, अस्तित्व का मूल तत्व एक ही है।

यह समझ संयम, करुणा और आत्म-नियंत्रण को बढ़ावा देती है। जब व्यक्ति यह जान जाता है कि समस्त सृष्टि एक ही स्रोत से उत्पन्न हुई है, तब संतुलित और मानवीय व्यवहार स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है।

उन्होंने सत्य, अहिंसा, चोरी न करना, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और आत्म-अनुशासन को भारतीय परंपरा के मूल स्तंभ बताया और इन्हें न केवल नैतिक मूल्य बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन का आधार भी बताया।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि कानून की सीमाएं हैं और यह जीवन की सभी जटिलताओं का समाधान नहीं कर सकता।

एक निश्चित सीमा के बाद, समाज को धर्म के समर्थन की आवश्यकता होती है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने कभी भी बल, सैन्य शक्ति या आर्थिक दबाव के माध्यम से अपने मूल्यों को दुनिया पर थोपने का प्रयास नहीं किया है।

आरएसएस प्रमुख ने आगे कहा कि भारत ने हमेशा उदाहरण प्रस्तुत करने का लक्ष्य रखा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और यह केवल भारतीय समाज की परंपरागत दृष्टिकोण से ही सुलझाया जा सकता है।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहन भागवत ने असंतुलन के बारे में क्या कहा?
मोहन भागवत ने कहा कि असंतुलन आज के वैश्विक संकटों का मुख्य कारण है और यह केवल प्रौद्योगिकी या सैन्य शक्ति से नहीं सुलझ सकता।
आरएसएस के प्रमुख का भारत के नैतिक दायित्व के बारे में क्या विचार है?
उन्होंने कहा कि भारत का नैतिक दायित्व है कि वह विश्व में धर्म और नैतिक मूल्यों का प्रसार करे।
भारतीय संस्कृति में नैतिकता का क्या महत्व है?
भारतीय संस्कृति में नैतिकता और धर्म केवल विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन शैली हैं जो सामाजिक संतुलन को बनाए रखती हैं।
क्या असंतुलन के कारणों में विकास भी शामिल है?
जी हां, भागवत ने कहा कि अनियंत्रित विकास ने मानवता और प्रकृति के संबंध को कमजोर किया है।
आरएसएस प्रमुख का क्या मानना है कि समाज को किस चीज़ की आवश्यकता है?
उन्होंने कहा कि समाज को धर्म के समर्थन की आवश्यकता होती है, क्योंकि कानून हर जटिलता का समाधान नहीं कर सकता।
राष्ट्र प्रेस
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