स्नेहा खानवलकर: 'ओ वुमनिया' से हिंदी सिनेमा के संगीत को बदलने वाली क्रांतिकारी कंपोज़र
सारांश
Key Takeaways
- स्नेहा खानवलकर का जन्म 28 अप्रैल 1983 को हुआ और वे इंदौर में पली-बढ़ी हैं।
- उन्होंने 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' (2012) के लिए संगीत दिया जिसमें 'ओ वुमनिया', 'हंटर' और 'इलेक्ट्रिक पिया' जैसे कालजयी गाने शामिल हैं।
- 'ओ वुमनिया' के लिए उन्होंने पटना की गलियों में खोज की और रेखा झा को इस गाने के लिए चुना।
- उनका परिवार ग्वालियर घराने से जुड़ा था, लेकिन उन्होंने शास्त्रीय परंपरा को तोड़कर लोक और ग्लोबल साउंड का अनूठा मेल बनाया।
- उन्होंने 'ओए लकी! लकी ओए!' के साउंडट्रैक से हरियाणा के लोक संगीत को मुख्यधारा में लाया।
- स्नेहा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की उन चुनिंदा महिला संगीत निर्देशकों में हैं जिन्होंने पुरुष-प्रधान क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
नई दिल्ली, 27 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। स्नेहा खानवलकर — यह नाम हिंदी फिल्म संगीत में उस बदलाव का प्रतीक है जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। 28 अप्रैल 1983 को जन्मी इस संगीत निर्देशक ने 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के कालजयी गीत 'ओ वुमनिया' से भारतीय सिनेमा की संगीत परंपरा को जड़ से हिला दिया। उनका संगीत स्टूडियो की चमक-दमक से नहीं, बल्कि बिहार की गलियों, कैरेबियाई द्वीपों और लोक संस्कृति की गहराइयों से जन्मता है।
लोक की जड़ों से उगा एक अनोखा सुर
इंदौर में पली-बढ़ी स्नेहा का परिवार ग्वालियर घराने से जुड़ा था, इसलिए शास्त्रीय संगीत उनके घर की हवा में घुला हुआ था। लेकिन स्नेहा ने इस विरासत को सीधे नहीं अपनाया — उन्होंने उसे समझा, तोड़ा और अपनी शर्तों पर फिर से गढ़ा। यही वजह है कि उनके संगीत में शास्त्रीय संगीत, देसी लोकगीत और ग्लोबल साउंड का ऐसा अनूठा संगम मिलता है जो कहीं और नहीं।
परिवार की इच्छा थी कि वे इंजीनियरिंग करें, लेकिन स्नेहा ने मुंबई का रुख किया। वहाँ उन्होंने एनीमेशन और आर्ट डायरेक्शन में भी हाथ आजमाया, मगर संगीत का बुलावा इतना गहरा था कि वे वापस लौट आईं।
पहली पहचान और इंडस्ट्री में दस्तक
स्नेहा को पहली बड़ी पहचान राम गोपाल वर्मा की प्रोडक्शन फिल्म 'गो' से मिली। इसके बाद 'सरकार राज' में एक गाने ने इंडस्ट्री का ध्यान उनकी ओर खींचा। लेकिन असली धमाका 'ओए लकी! लकी ओए!' से हुआ, जिसका साउंडट्रैक हरियाणा के लोक संगीत से प्रेरित था और इतना अलग था कि श्रोताओं को रुककर सुनना पड़ा।
यह वह दौर था जब हिंदी फिल्म संगीत में म्यूजिक डायरेक्शन पर पुरुषों का एकछत्र राज था। ऐसे माहौल में एक महिला का इस क्षेत्र में अपनी जगह बनाना छोटी बात नहीं थी — यह एक सांस्कृतिक झटका था। हालाँकि स्नेहा खुद इस 'अकेली महिला' वाले टैग को ज्यादा तवज्जो नहीं देतीं। उनका मानना है कि या तो काम बोलता है, या नहीं।
गैंग्स ऑफ वासेपुर — एक संगीत क्रांति
अनुराग कश्यप की महाकाव्य फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' (2012) स्नेहा के करियर का सबसे चमकदार अध्याय है। इस फिल्म के लिए उन्होंने सिर्फ धुनें नहीं बनाईं — उन्होंने एक पूरी ध्वनि-यात्रा की। बिहार की भीड़ भरी गलियों से लेकर कैरेबियाई द्वीपों तक घूमकर उन्होंने आवाजें और सुर इकट्ठे किए।
'ओ वुमनिया' के लिए स्नेहा पटना की गलियों में भटकीं और वहीं उनकी मुलाकात रेखा झा से हुई, जिनकी कच्ची, बेलौस आवाज ने इस गीत को अमर बना दिया। 'हंटर' और 'इलेक्ट्रिक पिया' जैसे गाने भी महज ट्रैक नहीं, बल्कि जीती-जागती कहानियाँ हैं। खासतौर पर 'ओ वुमनिया' ने जिस तरह स्त्री-स्वर को केंद्र में रखा, वह हिंदी सिनेमा में दुर्लभ था।
संगीत का वह अंदाज जो भीड़ से अलग करता है
स्नेहा का संगीत पॉलिश्ड या ग्लैमरस नहीं होता — वह कच्चा, असली और जीवंत होता है। वे महंगे स्टूडियो कंसोल्स से ज्यादा भरोसा लोगों की आवाज, उनके परिवेश और उनकी कहानियों पर रखती हैं। इसीलिए उनका हर गाना एक भूगोल, एक संस्कृति और एक गहरे एहसास को साथ लेकर आता है।
गौरतलब है कि जब भारतीय फिल्म संगीत डिजिटल स्ट्रीमिंग के युग में प्रवेश कर रहा है, तब स्नेहा जैसी कंपोज़र की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। उनके गाने Spotify, YouTube और अन्य प्लेटफॉर्म पर आज भी करोड़ों बार सुने जाते हैं, जो साबित करता है कि असली कला समय की कसौटी पर खरी उतरती है।
विरासत और आगे की राह
स्नेहा खानवलकर ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय संगीत की असली ताकत उसकी विविधता में है — शास्त्रीय परंपरा से लेकर बिहार के लोकगीत और कैरेबियाई ताल तक। उनका काम आने वाली पीढ़ियों की महिला संगीतकारों के लिए एक प्रेरक मिसाल है।
आने वाले समय में उनके नए प्रोजेक्ट्स और सहयोग पर संगीत प्रेमियों की नजर बनी रहेगी, क्योंकि जब भी स्नेहा खानवलकर कुछ नया करती हैं, हिंदी सिनेमा का संगीत एक नई करवट लेता है।