क्या तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के प्रति समाज का रवैया शर्मनाक है?

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क्या तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के प्रति समाज का रवैया शर्मनाक है?

सारांश

मौलाना इसहाक गोरा ने महिलाओं के प्रति समाज की असंवेदनशीलता पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि तलाकशुदा और विधवा महिलाओं को सम्मान नहीं मिल रहा है, जबकि उन्हें सबसे अधिक सहारे की आवश्यकता होती है। क्या समाज को अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने की आवश्यकता नहीं है?

Key Takeaways

  • महिलाओं के प्रति सम्मान का होना जरूरी है।
  • तलाक या विधवा होना किसी का दोष नहीं।
  • समाज को महिलाओं को सहारा देने की आवश्यकता है।
  • इस्लाम ने महिलाओं को नए सिरे से जीवन जीने का अधिकार दिया है।
  • सामाजिक रूढ़ियों को छोड़कर बदलाव की आवश्यकता है।

सहारनपुर, 19 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। देवबंद के प्रतिष्ठित आलिम-ए-दीन और जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने महिलाओं के सम्मान और उनके प्रति समाज में फैले रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के साथ समाज का व्यवहार न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह नैतिकता और मानवीय मूल्यों के भी विरुद्ध है।

हाल ही में जारी एक वीडियो संदेश में मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि महिलाओं के सम्मान के सवाल पर हमारा समाज आज भी अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पा रहा है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि जिन महिलाओं को सहारे, अपनत्व और इज्जत की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उन्हें शक, तानों और सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

अपने संदेश में उन्होंने स्पष्ट किया कि तलाक या विधवा होना किसी महिला का दोष नहीं, बल्कि जीवन की एक कठिन और पीड़ादायक परीक्षा है। इसके बावजूद समाज ऐसे हालात से गुजर रही महिलाओं को रहमत और हमदर्दी की नजर से देखने के बजाय, उनके चरित्र और नीयत पर सवाल उठाने लगता है। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि समाज को अंदर से कमजोर और खोखला करने वाली भी है।

मौलाना कारी इसहाक गोरा ने जोर देकर कहा कि इस्लामी शिक्षाएं महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का पूरा अधिकार देती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि इस्लाम ने तलाकशुदा और बेवा महिलाओं को नए सिरे से जीवन शुरू करने का हक दिया है और समाज को उनके साथ इंसाफ और इज्जत का व्यवहार करने की शिक्षा दी है।

उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश आज हम धार्मिक शिक्षाओं की रूह को नजरअंदाज कर केवल सामाजिक रूढ़ियों और गलत परंपराओं के पीछे चल पड़े हैं। इसका परिणाम यह होता है कि पीड़ित महिला को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, जबकि उसे सबसे अधिक सहारे, भरोसे और सम्मान की आवश्यकता होती है।

वीडियो संदेश के माध्यम से मौलाना ने समाज के सभी वर्गों से आत्ममंथन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि हम वास्तव में एक सभ्य, नैतिक और स्वस्थ समाज का निर्माण चाहते हैं तो महिलाओं के प्रति अपने रवैये में ईमानदार और व्यवहारिक बदलाव लाना होगा। केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से यह साबित करना होगा।

मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि महिलाओं की इज्जत किसी पर एहसान नहीं, बल्कि उनका बुनियादी और नैसर्गिक अधिकार है। तलाकशुदा और बेवा महिलाओं को इल्जाम नहीं, बल्कि सम्मान, सहारा और नई शुरुआत का अवसर मिलना चाहिए। यही इंसानियत है, यही धर्म की सच्ची तालीम और यही एक स्वस्थ समाज की पहचान है।

Point of View

बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने की मजबूती के लिए आवश्यक है।
NationPress
19/01/2026

Frequently Asked Questions

मौलाना इसहाक गोरा ने महिलाओं के सम्मान के बारे में क्या कहा है?
उन्होंने कहा कि समाज में तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलता है, जो नैतिकता के खिलाफ है।
क्या समाज को महिलाओं के प्रति अपने रवैये में बदलाव लाना चाहिए?
जी हाँ, मौलाना ने कहा कि समाज को महिलाओं के प्रति सम्मान और सहारा देने की आवश्यकता है।
इस्लाम तलाकशुदा और विधवा महिलाओं के बारे में क्या कहता है?
इस्लाम ने इन महिलाओं को नए जीवन की शुरुआत करने का अधिकार दिया है और उनके साथ इंसाफ का व्यवहार करने की शिक्षा दी है।
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