गुलशन मेहता: इंडस्ट्री में पहला ब्रेक एक्टिंग न करने की शर्त पर मिला
सारांश
Key Takeaways
- गुलशन बावरा का संघर्ष प्रेरणादायक है।
- उन्हें पहला ब्रेक रविंद्र दुबे ने दिया।
- गीतकार बनने के लिए एक शर्त थी कि वे एक्टिंग नहीं करेंगे।
- उन्होंने कई प्रसिद्ध फिल्मों में छोटे किरदार निभाए।
- उनकी जयंती 12 अप्रैल को मनाई जाती है।
मुंबई, 11 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। ‘चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया, एक धनवान की बेटी ने निर्धन का दामन छोड़ दिया’ और 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी दोस्ती' जैसे गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। ये गाने सदाबहार हैं, लेकिन उनके पीछे की कहानी, प्रसिद्ध गीतकार गुलशन कुमार मेहता के संघर्ष के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
गुलशन कुमार मेहता, जिन्हें गुलशन बावरा के नाम से भी जाना जाता है, के द्वारा लिखे गए कई प्रसिद्ध गीत आज भी गाए जाते हैं। एक गीतकार बनने के लिए उन्हें एक शर्त का सामना करना पड़ा। 12 अप्रैल को उनके जन्मदिन के अवसर पर हम उनके जीवन के अनदेखे पहलुओं पर चर्चा करेंगे।
गुलशन बावरा का जन्म विभाजन से पहले पाकिस्तान के शेखुपुर में हुआ था। विभाजन के समय उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया और फिर दिल्ली आकर जीवन बिताया। रेलवे में क्लर्क के रूप में काम करते हुए भी कविता लेखन में उनकी रुचि बनी रही। बाद में उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया, लेकिन उनके सामने निर्माता और निर्देशक रविंद्र दुबे ने एक शर्त रखी।
रविंद्र दुबे ने उन्हें 1958 और 1959 में रिलीज हुई फिल्म चंद्रसेना और सट्टा बाजार में गीत लिखने का अवसर दिया, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि उन्हें केवल गीत लिखने तक ही सीमित रहना होगा, कभी भी एक्टिंग नहीं करनी होगी। गुलशन बावरा ने इस बात का जिक्र एक पुराने इंटरव्यू में किया था।
गुलशन बावरा ने कहा, “मैं फिल्म इंडस्ट्री में नया था और मुझे सिर्फ एक गीतकार बनना था। मैंने इस शर्त को स्वीकार कर लिया।” फिल्म सट्टा बाजार के दौरान उनके रंग-बिरंगे कपड़ों और गहरी लेखनी के कारण शांतिभाई दबे ने उन्हें 'बावरा' नाम दिया।
उन्होंने हिंदी सिनेमा की कई फिल्मों में छोटे रोल किए हैं, जैसे कि 1967 में आई 'उपकार', 'जाने-अनजाने', 'बेईमान', 'बीवी हो तो ऐसी', 'आप के दीवाने', और 'अगर तुम न होते'।