क्या हिंदी भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम है या भावनाओं की अभिव्यक्ति?
सारांश
Key Takeaways
- हिंदी भाषा की गहराई और महत्व को समझें।
- हर साल 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाया जाता है।
- हिंदी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।
- यूनेस्को ने हिंदी को 1948 में अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया।
- हिंदी का विकास और प्रसार एक महत्वपूर्ण कार्य है।
नई दिल्ली, 9 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। “हिंदी भाषा सिर्फ एक संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई का प्रतीक है। सदियों से यह हर भारतीय के विचारों में गहराई से समाई हुई है।” हिंदी आज केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, जो हमारे प्राचीन ज्ञान, ऐतिहासिक विरासत और आधुनिकता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करती है। हर वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाने वाला ‘विश्व हिंदी दिवस’ हर भारतीय को अपनी हिंदी की सांस्कृतिक धरोहर और वैश्विक महत्व पर गर्व करने के साथ-साथ इसके प्रसार के लिए प्रेरित करता है।
यह गर्व की बात है कि हिंदी को यूनेस्को की 9 आधिकारिक भाषाओं में से एक माना गया है। यह सरल, सहज और वैज्ञानिक भाषा है, जिसे दुनियाभर में समझने वाले और बोलने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में, 100 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते या समझते हैं।
पिछले वर्ष, जब संयुक्त राष्ट्र ने हिंदी की वैश्विक महत्व को मान्यता दी, तब भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पी हरीश ने याद दिलाया कि 1949 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी का प्रयोग किया गया था। इससे पहले, यूनेस्को ने 1948 में हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषाओं में शामिल किया था, जिसके बाद से भारत और पड़ोसी देशों में कई कार्यक्रम हिंदी में आयोजित होते हैं।
भारत में सबसे पहले हिंदी दिवस का आयोजन वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा 10 जनवरी को किया गया था, और तब से यह ‘विश्व हिंदी दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है।
संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल 21 भाषाओं के बीच हिंदी का विशेष स्थान है। हिंदी के विकास के लिए राजभाषा विभाग का गठन किया गया है, जो यह सुनिश्चित करता है कि केंद्र सरकार के कार्य हिंदी में अधिक से अधिक हों।
हिंदी एक ऐसी भाषा है जो जिसने भी समझी, वह उसके दिल में बस गई। भारत में अनेक भाषाएँ होने के बावजूद, हिंदी के लिए आंदोलन करने वाले कई व्यक्तियों की मातृभाषा हिंदी नहीं थी। सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, काका साहब कालेलकर और राजगोपालाचार्य जैसे महान व्यक्तियों ने हिंदी के संरक्षण और विकास के लिए प्रयास किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पर अपने संबोधन में चर्चा की।
पिछले एक दशक में, भारत सरकार ने हिंदी के प्रचार-प्रसार को प्राथमिकता दी है, विशेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसकी मान्यता बढ़ाने के लिए। सितंबर 2024 में ‘बहुभाषिकता’ पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव में हिंदी का उल्लेख किया गया।
साल 2018 में, संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार के बीच हिंदी को बढ़ावा देने के लिए एक स्वैच्छिक वित्तीय योगदान समझौता हुआ। इसके तहत, संयुक्त राष्ट्र ने हिंदी में कई सोशल मीडिया अकाउंट और एक हिंदी वेबसाइट की शुरुआत की। इसके अतिरिक्त, यूएन रेडियो पर हिंदी में कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है और हिंदी में एक साप्ताहिक समाचार बुलेटिन भी जारी किया जाता है।
भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंदी का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा हुआ है, और इसके विकास को प्राकृत के अंतिम अपभ्रंश अवस्था से जोड़ा गया है। हिंदी साहित्य का आरंभ 8वीं शताब्दी से माना जाता है।
अपनी उत्पत्ति के बाद से हिंदी भाषा ने समृद्धि प्राप्त की है और इसका उपयोग तकनीकी और सोशल मीडिया में भी बढ़ रहा है।