क्या बासु चटर्जी का सिनेमा प्रेम कहानियों को एक नई दिशा देता है?
सारांश
Key Takeaways
- बासु चटर्जी ने मिडिल-ऑफ-द-रोड सिनेमा को नई पहचान दी।
- उनकी फिल्में बिना मेलोड्रामा के वास्तविकता को दर्शाती हैं।
- उन्होंने अमोल पालेकर को मिडिल क्लास आदमी के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
- उनके टेलीविजन धारावाहिकों ने भी दर्शकों के दिलों में जगह बनाई।
- उनकी रचनाएं आज भी सिनेमा में प्रेरणा का स्रोत हैं।
नई दिल्ली, 9 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय फिल्मों के प्रतिभाशाली निर्देशक बासु चटर्जी को मिडिल-ऑफ-द-रोड सिनेमा का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने ऐसी फिल्में बनाई, जो मेनस्ट्रीम एंटरटेनमेंट और पैरेलल सिनेमा के बीच एक खूबसूरत संतुलन स्थापित करती थीं।
बासु चटर्जी की रचनाएं साधारण प्रेम कहानियों, भारतीय मिडिल क्लास के दैनिक जीवन, वैवाहिक जीवन की समस्याओं और हल्के हास्य को बिना किसी अधिक मेलोड्रामा या एक्शन के प्रस्तुत करती हैं। 10 जनवरी को बासु चटर्जी की जयंती है।
उनकी खासियत यह थी कि उनकी कहानियां बिना किसी झूठी सजावट के आम जन की वास्तविकताओं से जुड़ी होती थीं। उनका जन्म 10 जनवरी 1930 को अजमेर (राजस्थान) में एक बंगाली परिवार में हुआ था। उन्होंने मुंबई में एक कार्टूनिस्ट और इलस्ट्रेटर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और 18 वर्षों तक एक पत्रिका के लिए काम किया। 1966 में, उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में फिल्म उद्योग में कदम रखा। उनकी पहली निर्देशित फिल्म 'सारा आकाश' थी, जो 1969 में प्रदर्शित हुई, जिसमें वैवाहिक जीवन की मुश्किलों को गहराई से दर्शाया गया।
उनकी फिल्मों की एक विशेषता थी साधारण प्रेम कहानियां, जहां नायक गुंडों से नहीं लड़ता, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों से प्यार करता है। अमोल पालेकर को मिडिल क्लास आदमी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। उनकी सफल फिल्मों में 'छोटी सी बात' (1975), 'रजनीगंधा' (1974), चितचोर, खट्टा-मीठा, और 'बातों बातों में' शामिल हैं।
उन्होंने शानदार टेलीविजन शो भी प्रस्तुत किए। दूरदर्शन चैनल के लिए उन्होंने आइकॉनिक धारावाहिक 'ब्योमकेश बख्शी' का निर्माण किया, जिसका प्रसारण 1993 से 1997 तक हुआ। इस शो में राजित कपूर ने बंगाली जासूस का किरदार निभाया। वहीं, 1985 में आए शो 'रजनी' में प्रिया तेंदुलकर ने सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाई। इन धारावाहिकों ने 80 और 90 के दशक में बड़े पैमाने पर लोकप्रियता प्राप्त की।
बासु चटर्जी की फिल्में न केवल आम दर्शकों, बल्कि फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के बीच भी बेहद पसंद की जाती थीं। उनकी पहली निर्देशित फिल्म 'सारा आकाश' को उन्होंने फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन और मैक्सिकन जैसी विदेशी फिल्मों से मिली प्रेरणा के आधार पर बनाया था।
उनके अनुसार, इस फिल्म की सबसे बड़ी सराहना उस समय के मशहूर निर्देशक मृणाल सेन ने की थी। मृणाल सेन ने कहा था, "हम लोग तो दर्शकों के लिए फिल्में बनाते हैं, लेकिन आपने यह फिल्म हमारे लिए बनाई है।"
बासु चटर्जी की विरासत और टीवी तथा सिनेमा में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। 4 जून 2020 को 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।