कस्तूरबा गांधी: महात्मा गांधी की प्रेरणा और संघर्ष की कहानी
सारांश
Key Takeaways
- कस्तूरबा गांधी ने अपने पति महात्मा गांधी का जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- वह सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में सक्रिय रहीं।
- कस्तूरबा का साहस और दृढ़ता अद्वितीय थी।
- उनका जीवन प्रेम और समर्पण की मिसाल है।
- महात्मा गांधी ने उन्हें अहिंसा का पहला पाठ सिखाने वाली गुरु माना।
नई दिल्ली, 10 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। महात्मा गांधी के महानायक बनने की यात्रा में अक्सर एक नाम अनदेखा किया जाता है। वह शख्सियत गांधीजी की सबसे बड़ी संबल और शक्ति थीं, जो उनके जीवन में अनमोल थीं। कस्तूरबा गांधी, जिन्हें देशवासी 'बा' कहते थे, गांधीजी के साथ अपने जीवन के हर मोड़ पर खड़ी रहीं।
कस्तूरबा का जन्म 11 अप्रैल 1869 को पोरबंदर में हुआ था। वह गोकुलदास और व्रजकुंवर की संतान थीं। उनके पिता एक प्रमुख व्यापारी थे, जिनका व्यापार अफ्रीका और मध्य पूर्व के अनाज, कपड़े और कपास के बाजारों में फैला हुआ था। यह परिवार मोहनदास गांधी के पिता के करीबी मित्रों में था। दोनों परिवारों ने अपने बच्चों की शादी कर दोस्ती को और मजबूत किया। उनकी सगाई 7 साल की उम्र में हुई थी और विवाह 1882 में हुआ जब कस्तूरबा की उम्र 13 वर्ष थी।
'बा' केवल महात्मा गांधी की पत्नी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र महिला भी थीं। कई बार उन्होंने गांधीजी से असहमति जताई और उनकी गलतियों पर प्रकाश डाला। एक वेबसाइट 'एमके गांधी.ओआरजी' पर इतिहासकार विनय लाल के अनुसार, कस्तूरबा का आत्मबल और स्वतंत्रता का प्रमाण उनकी आत्मकथा में मिलता है, जहां उनकी दृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता का उल्लेख है।
गांधीजी की इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका की यात्राओं के दौरान, कस्तूरबा को वर्षों तक उनसे दूर रहना पड़ा। अपने बच्चों की देखभाल करते हुए उन्होंने धैर्यपूर्वक यह समय बिताया। अक्षर ज्ञान की कमी के कारण संदेशों का आदान-प्रदान उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। इतिहासकार अपर्णा बसु के अनुसार, 'बा' में शारीरिक और नैतिक साहस था। उन्होंने हर परिस्थिति का सामना किया और जेल की कठिनाइयों में भी अपनी साथी महिला कैदियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं।
1914 में जब गांधी और कस्तूरबा भारत लौटे, तब कस्तूरबा ने एक राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर अपनी पहचान बनाई। महात्मा गांधी ने लिखा, "वह बहुत जिद्दी थीं और अपनी इच्छा से काम करती थीं।" उनके साथ कई बार अलगाव हुआ, लेकिन जैसे-जैसे गांधीजी का सार्वजनिक जीवन बढ़ता गया, कस्तूरबा का व्यक्तित्व और निखरता गया।
कस्तूरबा की सरलता में उनकी प्रबल शक्ति छिपी थी। उन्होंने अपने पति की विभिन्न भूमिकाओं का सामना किया और भारतीयों के लिए समानता की खोज में सहयोग दिया।
वह पहले सत्याग्रहियों में से एक थीं, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीकी सरकार के फैसले का विरोध किया। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भागीदारी महात्मा गांधी को समर्थन देने से कहीं अधिक थी; वह अब कस्तूर 'बा' बन चुकी थीं। महात्मा गांधी ने उन्हें अहिंसा का पहला पाठ सिखाने वाली गुरु माना।
जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तब महात्मा गांधी को पहले ही जेल में डाल दिया गया। कस्तूरबा को उनकी जगह संबोधित करने के लिए कहा गया, लेकिन जब उन्हें रोक लिया गया, तो उन्होंने कहा, "मुझे लग रहा है कि मैं जिंदा नहीं लौट पाऊंगी।"
जिस कोठरी में उन्हें रखा गया था, वह गंदी थी और वह बीमार पड़ गईं। बाद में उन्हें पुणे के आगा खान पैलेस ले जाया गया, जहां वह अपनी अंतिम सांस लीं। 22 फरवरी 1944 की शाम, उन्होंने बापू की गोद में अंतिम सांस ली और 23 फरवरी को उनका अंतिम संस्कार किया गया।
महात्मा गांधी ने कहा, "यह अंतिम विदाई है, 62 वर्षों के साझा जीवन का अंत।" उस दिन उन्होंने कहा, "मैं बा के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकता।"