क्या 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता का मंत्र है? गुजरात की झांकी ने दिखाया राष्ट्रीय ध्वज का सफर
सारांश
Key Takeaways
- 'वंदे मातरम' का भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है।
- गुजरात की झांकी ने ध्वज के इतिहास को सुंदरता से प्रस्तुत किया।
- स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के विचार को पुनः जागृत किया गया।
- गणतंत्र दिवस परेड में विभिन्न राज्यों की झांकियाँ शामिल थीं।
- महात्मा गांधी के संदेश को भी झांकी में दर्शाया गया।
नई दिल्ली, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 'वंदे मातरम' एक ऐसा मंत्र है, जो हर भारतीय के भीतर स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता की भावना को जागृत करता है। 'वंदे मातरम' गीत की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर, इस विषय की अभिव्यक्ति के रूप में ‘वंदे मातरम’ शब्द की पृष्ठभूमि से शुरू हुई भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण की यात्रा, उसके परिवर्तनशील स्वरूप और इतिहास की दिलचस्प प्रस्तुति, 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में गुजरात की झांकी का मुख्य आकर्षण बनी।
इस झांकी ने गुजरात के नवसारी में जन्मी और गुर्जर भूमि के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों- श्यामजी कृष्ण वर्मा और सरदार सिंह राणा के साथ, विदेशी धरती पर क्रांतिज्योत जगाने वाली मैडम भीकाजी कामा द्वारा डिज़ाइन किए गए भारतीय ध्वज की महाकथा का वृत्तांत प्रस्तुत किया, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा है। साथ ही, महात्मा गांधी की स्मृति में ‘चरखे’ के माध्यम से स्वदेशी का संदेश देने वाले आत्मनिर्भर भारत अभियान का अद्भुत समन्वय भी दिखाया गया।
झांकी के अगले हिस्से में वीरांगना मैडम भीकाजी कामा को उनके द्वारा डिज़ाइन किए गए ध्वज के साथ प्रदर्शित किया गया, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा था, जिसे उन्होंने पहली बार विदेशी धरती पर 1907 में पेरिस में फहराया था। इस ध्वज को जर्मनी के स्टटगार्ट, बर्लिन में ‘इंडियन सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस’ में भी लहराया गया। मैडम कामा की ध्वज लहराते अर्ध-प्रतिमा के नीचे संविधान में सूचीबद्ध सभी भारतीय भाषाओं में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था।
झांकी के मध्य हिस्से में राष्ट्रीय ध्वज की निर्माण यात्रा, उसके बदलते स्वरूप और इतिहास को प्रदर्शित किया गया। इसकी शुरुआत 1906 से होती है, जब कलकत्ता (अब कोलकाता) के पारसी बागान में क्रांतिकारियों ने विदेशी वस्तुओं की होली जलाते हुए पहली बार ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ ध्वज फहराया। इसके बाद, 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस में ध्वज फहराया, जिसे उन्होंने स्वयं डिज़ाइन किया था। 1917 में होमरूल आंदोलन के दौरान डॉ. एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने एक नया ध्वज फहराया।
वहीं, 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में युवा क्रांतिवीर पिंगली वेंकैया ने एक नई डिज़ाइन का ध्वज बनाया और उसे गांधी जी को दिखाया। 1931 में पिंगली द्वारा तैयार किए गए ध्वज को लगभग स्वीकृति मिल गई, जिसमें तीन रंग थे और उसके केंद्र में चरखा था। अंततः 22 जुलाई, 1947 को भारतीय संविधान सभा ने झंडे के केंद्र में चरखे की जगह धर्म चक्र के साथ तिरंगे को इसके वर्तमान स्वरूप में स्वीकार किया। इस निर्माण यात्रा के साथ भारत की आज़ादी के महत्वपूर्ण आंदोलनों का भी इस झांकी में प्रदर्शन किया गया।
झांकी के अंतिम हिस्से में ‘चरखे’ के माध्यम से स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना को जागृत करने वाले महात्मा गांधी का स्वरूप एक विशाल धर्म चक्र के साथ प्रस्तुत किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता के इन सशक्त मूल्यों को लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं।
देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर सपूतों को याद करते हुए, ‘राष्ट्रीय शायर’ की उपाधि से सम्मानित गुजराती रचनाकार झवेरचंद मेघाणी द्वारा रचित गीत ‘कसुंबी नो रंग’ की लय और ताल पर उत्साही कलाकार झांकी को जीवंत बना रहे थे।
गुजरात सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रस्तुत इस झांकी के निर्माण में सूचना एवं प्रसारण सचिव डॉ. विक्रांत पांडे, सूचना आयुक्त किशोर बचाणी, अपर निदेशक अरविंद पटेल के मार्गदर्शन में संयुक्त सूचना निदेशक डॉ. संजय कचोट और उप सूचना निदेशक भावना वसावा ने योगदान दिया।
इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड में 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अलावा केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की 13 झांकियों सहित कुल 30 झांकियां प्रदर्शित की गईं। कर्तव्य पथ पर हुई सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में लगभग 2,500 कलाकारों ने भाग लिया। देशभर से लगभग 10,000 विशेष अतिथियों को आमंत्रित किया गया था।
परेड की शुरुआत ‘राष्ट्रीय युद्ध स्मारक’ पर एक गौरवपूर्ण श्रद्धांजलि के साथ हुई, जहां प्रधानमंत्री ने शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद, राष्ट्रपति सलामी मंच पर पहुंचीं और राष्ट्रगान हुआ तथा 21 तोपों की सलामी के साथ समारोह की औपचारिक शुरुआत हुई।
77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपियन यूनियन के दो वरिष्ठ नेता यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा उपस्थित रहे।
इस वर्ष 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में पहली बार ‘साइलेंट वॉरियर्स’ के रूप में पहचाने जाने वाले पशुओं ने भी परेड में हिस्सा लिया। इसमें मंगोलियन प्रजाति के बेक्ट्रियन ऊंट, सियाचिन ग्लेशियर में काम करने वाले खच्चर, शिकारी पक्षी और सैन्य श्वान दस्ते सलामी मंच के सामने से गुजरे।
सेना के विभिन्न अंगों के करतबों के साथ इस वर्ष पहली बार केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व 26 वर्षीय सहायक कमांडेंट सिमरन बाला ने किया। गुजरात में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली सिमरन ने गांधीनगर के सरकारी महिला कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और सीआरपीएफ की सहायक कमांडेंट की परीक्षा उत्तीर्ण की। साथ ही, यूरोपियन यूनियन की टुकड़ी ने भी इस परेड में भाग लिया। इस वर्ष की परेड में पहली बार भारतीय सेना ने रणभूमि व्यूह रचना यानी ‘बैटल एरे’ फॉर्मेट की झलक दिखाई, जिसमें परंपरागत मार्चिंग दस्ते और सेवा प्रस्तुतियां शामिल थीं।