पुष्कर धामी ने मां चण्डिका देवी मंदिर की महत्ता के बारे में साझा किया अद्भुत अनुभव
सारांश
Key Takeaways
- मंदिर का इतिहास: मां चण्डिका देवी मंदिर प्राचीन सिद्धपीठ है।
- पवित्रता: यह स्थान श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
- विशेष उत्सव: यहां हर साल नवरात्रि और चण्डिका बन्याथ उत्सव मनाए जाते हैं।
- प्राकृतिक सौंदर्य: मंदिर चारों ओर से पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है।
- आस्था का केंद्र: यह मंदिर भक्तों के लिए आस्था का एक बड़ा केंद्र है।
उत्तराखंड, 4 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के संगम पर स्थित बीरो देवल मां चण्डिका देवी मंदिर आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यह प्राचीन मंदिर देवी काली को समर्पित एक सिद्धपीठ माना जाता है। यहां की दिव्य ऊर्जा, तंत्र साधना और अद्भुत प्राकृतिक दृश्य श्रद्धालुओं को दूर-दूर से आकर्षित करते हैं।
मंदिर की पवित्रता और दिव्यता दूर-दूर तक फैली हुई है, जिसे देखने के लिए भक्तजन यहां आते हैं। नवरात्रि के समय यहां विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को इस मंदिर की महिमा का बखान किया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक वीडियो साझा किया और लिखा, "बीरो देवल, रुद्रप्रयाग में स्थित मां चण्डिका देवी मंदिर अनेक श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है। इस पवित्र स्थान पर आने वाले भक्त आध्यात्मिक शांति और दिव्य ऊर्जा का अनुभव करते हैं। यहां की पूजा-अर्चना की परंपरा भी बहुत खास है। आप भी रुद्रप्रयाग आने पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"
बीरो देवल का यह मंदिर गढ़वाल क्षेत्र की लोक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां मां चण्डिका को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के चारों ओर पहाड़ों, हरियाली और नदियों का संगम इसे और भी आकर्षक बनाता है। हर साल नवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष उत्सव मनाए जाते हैं, जिसमें श्रद्धालु दूर-दूर से शामिल होते हैं। यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में अगस्त्यमुनि ब्लॉक के अंतर्गत ऊंचे शिखर पर स्थित है।
हर 20-21 वर्षों के बाद चण्डिका बन्याथ नामक उत्सव मनाया जाता है। चण्डिका बन्याथ (या महा बनियाथ) उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में बीरो देवल और आस-पास के क्षेत्रों की कुलदेवी चण्डिका माता को समर्पित एक प्रमुख लोक पर्व और धार्मिक अनुष्ठान है। यह सांस्कृतिक आयोजन पारंपरिक शक्ति उपासना, ढोल-दमाऊ की थाप, मंत्रोच्चार और देवी की भव्य शोभायात्रा के रूप में मनाया जाता है, जिसमें क्षेत्र के कई गांवों के श्रद्धालु भाग लेते हैं।
यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक है, जहां देवी को बेटी के रूप में विदाई देने का भावुक दृश्य भी देखने को मिलता है।