क्या मोहन राकेश की गरीबी के हालातों ने उनके साहित्य को प्रभावित किया?

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क्या मोहन राकेश की गरीबी के हालातों ने उनके साहित्य को प्रभावित किया?

सारांश

मोहन राकेश, एक अद्वितीय लेखक और नाटककार, जिन्होंने अपनी गरीबी और संघर्षों के माध्यम से साहित्य जगत में एक विशेष स्थान पाया। उनके जीवन के अनकहे पहलुओं और रचनात्मकता की गहराई को जानें।

Key Takeaways

  • मोहन राकेश का जीवन संघर्षों से भरा था।
  • उनकी रचनाएँ व्यक्तिगत अनुभवों से प्रेरित थीं।
  • गरीबी ने उनकी साहित्यिक यात्रा को प्रभावित किया।
  • उनका योगदान हिंदी साहित्य में अमूल्य है।
  • वे नाटककार के रूप में भी प्रसिद्ध हुए।

नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। "हममें से हर कोई अधूरा है, अधूरा है क्योंकि हसरतें अधूरी हैं, क्योंकि हम हमेशा पूर्णता की खोज में आधे अधूरे रहते हैं।" यह जीवन का एक कड़वा सच है जिसे एक लेखक ने गहराई से समझाया। वे थे प्रसिद्ध लेखक और नाटककार मोहन राकेश, जो आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में 'नई कहानी' आंदोलन के प्रमुख कथाकार माने जाते हैं। आज भी उनका साहित्य हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर माना जाता है।

8 जनवरी 1925 को पंजाब के अमृतसर में एक सिंधी परिवार में जन्मे मोहन राकेश पेशे से वकील थे। परंतु, साहित्य और संगीत के प्रति उनके गहरे प्रेम ने उन्हें एक ऐसे लेखक के रूप में स्थापित किया, जिसका कागज किसी चलचित्र की तरह था। उनके प्रसिद्ध नाटक 'आषाढ का एक दिन', 'आधे-अधूरे' और 'लहरों के राजहंस' आज भी बेजोड़ माने जाते हैं।

मोहन राकेश की जिंदगी ने उन्हें 'मोल' की कीमत समझने पर मजबूर किया। गरीबी के हालातों में, उनके पिता का निधन हो गया, जिससे उनका जीवन ही उलट गया। बात 1940-41 की है, जब राकेश लगभग 16 वर्ष के थे। उस रात जब उनके पिता का शरीर घर में पड़ा था, किराए की चिंता ने परिवार को और दुखी कर दिया। उनके मकान मालिक के बेटे ने चेतावनी दी कि "मैं मुर्दा नहीं उठने दूंगा जब तक किराया नहीं मिलता।"

गरीबी के कारण, राकेश का परिवार कई महीनों से किराया चुकाने में असमर्थ था। अंततः, उनकी मां ने अपनी चूड़ियां बेचकर किराया चुकाया, जिससे शव यात्रा में कोई बाधा नहीं आई। उस रात खिड़की के पास से उन्होंने अपनी जिंदगी के अंधेरों को देखा और यह महसूस किया कि उनकी जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। लेखिका प्रतिभा अग्रवाल ने मोहन राकेश की जिंदगी के इन क्षणों को 'व्यक्ति और व्यक्तित्व' में समेटा है।

राकेश की जिंदगी ने नया मोड़ लिया। उन्होंने कई शहरों में निवास किया, लेकिन स्थायित्व की कमी ने उन्हें और भी परेशान किया। उन्होंने तीन विवाह किए, लेकिन पहले दो असफल रहे।

मोहन राकेश की रचनाएं उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हैं। उनकी कहानियों में अकेलेपन का दर्द झलकता है। 'आषाढ का एक दिन' और 'लहों के राजहंस' जैसे नाटक उनके जीवन और मान्यताओं को दर्शाते हैं।

1958 में राकेश ने 'आषाढ का एक दिन' लिखा, जिसे 1959 में नाट्यलेखन का प्रथम पुरस्कार मिला। यह सम्मान उन्हें नाट्यकार के रूप में पहचान दिलाने में सहायक रहा। वे 48 वर्ष की आयु में 3 दिसंबर 1972 को हृदय गति रुकने से जीवन की अंतिम घड़ी में साहित्य की साधना में लगे रहे।

Point of View

बल्कि यह दर्शाती है कि किस प्रकार व्यक्तिगत संघर्ष और गरीबी ने उन्हें अपनी अद्भुत रचनाओं के लिए प्रेरित किया। उनका जीवन एक उदाहरण है कि कैसे कठिनाइयों का सामना करके भी एक व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है।
NationPress
08/01/2026

Frequently Asked Questions

मोहन राकेश कौन थे?
मोहन राकेश एक प्रतिष्ठित लेखक और नाटककार थे, जिन्हें हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
मोहन राकेश की प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'आषाढ का एक दिन', 'आधे-अधूरे' और 'लहरों के राजहंस' शामिल हैं।
मोहन राकेश का जन्म कब हुआ?
उनका जन्म 8 जनवरी 1925 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था।
मोहन राकेश का साहित्य में योगदान क्या है?
मोहन राकेश ने आधुनिक हिंदी साहित्य में 'नई कहानी' आंदोलन को प्रेरित किया और उनकी रचनाएँ आज भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
मोहन राकेश की मृत्यु कब हुई?
उनकी मृत्यु 3 दिसंबर 1972 को हुई, जब वे 48 वर्ष के थे।
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