पाकिस्तानी आर्मी की भूमिका: भाड़े के सैनिकों की तरह काम करने का आरोप
सारांश
Key Takeaways
- पाकिस्तान की सेना की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।
- रिपोर्ट में दागदार इतिहास और रणनीतिक विरोधाभासों का उल्लेख है।
- ईरान को परमाणु तकनीकी जानकारी देने का आरोप है।
- पाकिस्तान की दोहरी भूमिका की चर्चा की गई है।
- चीन के साथ संबंधों को महत्वपूर्ण बताया गया है।
तेल अवीव, 5 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनाव में खुद को एक बिचौलिए के रूप में प्रस्तुत करने की पाकिस्तान की कोशिश पर सवाल उठाए गए हैं। 'द टाइम्स ऑफ इजरायल' द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में पाकिस्तान के दागदार इतिहास और उसके रणनीतिक विरोधाभासों पर प्रकाश डाला गया है।
रिपोर्ट में उल्लिखित किया गया है कि पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था का स्वभाव संदिग्ध रहा है। यह कई बार वैश्विक मामलों में दोहरा चेहरा दर्शाती है।
इसके अनुसार, पाकिस्तान की मिलिट्री ने लंबे समय से वैश्विक भू-राजनीति में दोहरी भूमिका निभाई है। पत्रकार हसन मुजतबा ने उल्लेख किया कि “अधिकांश देशों की अपनी सेना होती है, लेकिन पाकिस्तान की सेना के पास एक देश है,” जो यह दर्शाता है कि वहां की सैन्य संस्था अक्सर पारंपरिक सीमाओं से बाहर जाकर काम करती है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान समय में पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित संघर्ष में “मध्यस्थ” के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन उसका अतीत इस भूमिका को और जटिल बनाता है। इसमें यह आरोप भी शामिल है कि मिर्जा असलम बेग के कार्यकाल में पाकिस्तान ने तेहरान को परमाणु तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान एक ओर ईरान के शिया शासन के साथ कार्यकारी संबंध बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर उसका प्रभाव सुन्नी समूहों पर भी देखने को मिलता है। यह दोहरा संतुलन पाकिस्तान की रणनीतिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आंतरिक स्तर पर भी विरोधाभासों को उजागर करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में शिया संगठनों, जैसे कि इमामिया स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन और जैनबियन, का नाम कई बार ईरान से जुड़े यूएस-इजरायल तनाव के जवाब में हुई हिंसक विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। इस तरह की अशांति ने कथित तौर पर आम लोगों और सुरक्षा कर्मियों, दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की सेना में शिया समुदाय का प्रतिनिधित्व सीमित रहा है, जिससे असंतोष की स्थिति बनी रहती है। इसमें मूसा खान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि 1960 के दशक के बाद से इस स्तर पर प्रतिनिधित्व कम देखने को मिला है।
ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में कोरियन युद्ध और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का हवाला दिया गया है, जिसमें पाकिस्तान की भूमिका और उससे जुड़े विवादों को रेखांकित किया गया है। लेख में 1971 की घटनाओं को “मिनी-होलोकॉस्ट” बताते हुए कहा गया कि पाकिस्तान को अब भी बांग्लादेश से औपचारिक माफी मांगनी चाहिए।
इसमें पाकिस्तान के ईरान और मोहम्मद रेजा पहलवी से पुराने रिश्तों का भी जिक्र किया गया है।
चीन के साथ पाकिस्तान के रिश्तों को भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बताया गया है। चीन के साथ उसके संबंधों को “हिमालय से ऊंचा और समुद्र से गहरा” बताते हुए दोनों देशों के बीच रक्षा और बुनियादी ढांचे सहित कई क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया गया है।
इस रिपोर्ट में पाकिस्तान के दोहरे मापदंड को उजागर किया गया है। उस पर अपने सुविधा के अनुसार भू-राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप है। चीन के उइगर मुसलमानों का जिक्र कर चुप्पी पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें एक उदाहरण के साथ पाकिस्तान की कलई खोली गई है।
रिपोर्ट में ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान के एबटाबाद में पाए जाने का भी उल्लेख है, जिससे सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका पर सवाल उठे हैं। इसके अलावा परवेज मुशर्रफ के शासनकाल के दौरान “डबल गेम” खेलने के आरोपों और अमेरिका से मिली वित्तीय सहायता का भी जिक्र किया गया है।
अंत में रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की मध्यस्थ बनने की कोशिशें एक रणनीतिक छवि निर्माण का हिस्सा प्रतीत होती हैं और जब तक इस प्रक्रिया में इजरायल और ईरान जैसे प्रमुख पक्ष शामिल नहीं होते, तब तक इसे विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। साथ ही चेतावनी दी गई है कि ईरान में किसी बड़े भू-राजनीतिक बदलाव का असर पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान क्षेत्र पर पड़ सकता है, जहां पहले से ही विद्रोह की स्थिति बनी हुई है।