क्या उत्तर प्रदेश के सीतापुर जेल में कैदियों के स्वदेशी उत्पादों से बाजार में रौनक बढ़ रही है?

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क्या उत्तर प्रदेश के सीतापुर जेल में कैदियों के स्वदेशी उत्पादों से बाजार में रौनक बढ़ रही है?

सारांश

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जेल में कैदियों ने स्वदेशी उत्पादों के माध्यम से न केवल अपनी पहचान बनाई है, बल्कि बाजार में भी एक नई रौनक उत्पन्न की है। जानें कैसे यह पहल उन्हें आत्मनिर्भर बना रही है।

मुख्य बातें

कैदियों की मेहनत से स्वदेशी उत्पादों का निर्माण।
आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम।
किफायती दामों पर उत्पादों की बिक्री।
समाज में सकारात्मक बदलाव की संभावना।
जेल प्रशासन की सराहनीय पहल ।

सीतापुर, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के कारागार में सजा काट रहे कैदी न केवल अपने जीवन में बदलाव की नई राह पर चल रहे हैं, बल्कि स्वदेशी उत्पादों के जरिए बाजार में भी अपनी पहचान बना रहे हैं। 'स्वदेशी अपनाओ, विदेशी भगाओ' का नारा यहां साकार होते हुए दिख रहा है, जहां कैदी गोबर, मिट्टी, लौंग और धूप जैसे प्राकृतिक सामान से कई तरह के स्वदेशी उत्पाद तैयार कर रहे हैं।

इन उत्पादों की बिक्री के लिए जेल परिसर के बाहर एक विशेष दुकान बनाई गई है। यहां तैयार किया गया सामान बेहद किफायती दामों पर बेचा जा रहा है, जिसे लोग बड़े चाव से खरीद रहे हैं। इस पहल से न केवल बाजार में रौनक बढ़ी है, बल्कि कैदियों के मनोबल और काम के प्रति लगन में भी स्पष्ट इजाफा हुआ है।

जेल प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य कैदियों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सम्मानजनक रोजगार का अवसर देना है ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। इससे उनमें सुधार की भावना भी मजबूत हो रही है।

बताया जाता है कि सीतापुर जिला कारागार पहले से ही सब्जी और फल उगाने के लिए चर्चा में रहा है। यहां उगाई गई सब्जियां बाजारों तक पहुंचती हैं। लेकिन, इस बार कैदियों ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए स्वदेशी उत्पादों के निर्माण की शुरुआत की है।

जेल के बाहर बने विक्रय केंद्र पर अगरबत्ती, धूपबत्ती, मिट्टी के दीपक, पायदान दरी, ऊनी दरी, कुल्हड़, झालर, धूनी कप, करवा जैसे कई तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं। इन सभी सामानों की कीमतें बाजार के मुकाबले कम रखी गई हैं ताकि आम लोग भी आसानी से इन्हें खरीद सकें।

इन उत्पादों की बिक्री से होने वाली कमाई का एक हिस्सा सीधे कैदियों को दिया जाता है। इससे उनके भीतर आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना पैदा होती है।

जेल वार्डन अनुराग मिश्रा ने बताया, "इस पहल का उद्देश्य यही है कि जेल के अंदर जो कैदी सजा काट रहे हैं, उनके हुनर को बाहर की दुनिया पहचान सके। यहां कैदी मिट्टी के बर्तन, अगरबत्ती और धूपबत्ती जैसे कई उत्पाद खुद अपने हाथों से तैयार कर रहे हैं।"

वहीं, ग्राहक दीपक भार्गव ने कहा, "यहां के सभी उत्पाद देसी और हाथ से बने हुए हैं। इनके दाम भी काफी उचित हैं। इन्हें खरीदकर अच्छा लगता है, क्योंकि इससे कैदियों को भी मदद मिलती है।"

जेल प्रशासन का मानना है कि यह पहल रोजगार के नजरिए से बेहद सफल साबित हो रही है और भविष्य में इसे और विस्तार दिया जाएगा ताकि ज्यादा से ज्यादा कैदियों को इस योजना से जोड़ा जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कैदियों के द्वारा कौन से स्वदेशी उत्पाद बनाए जा रहे हैं?
कैदी मिट्टी के दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, पायदान दरी, ऊनी दरी, कुल्हड़, और अन्य कई स्वदेशी उत्पाद बना रहे हैं।
क्या इन उत्पादों की बिक्री से कैदियों को लाभ होता है?
हाँ, इन उत्पादों की बिक्री से होने वाली कमाई का एक हिस्सा कैदियों को दिया जाता है, जिससे उनके भीतर आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है।
इस पहल का उद्देश्य क्या है?
इस पहल का उद्देश्य कैदियों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सम्मानजनक रोजगार का अवसर देना है।
राष्ट्र प्रेस