क्या सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए इक्विटी नियम 3(सी) को चुनौती दी गई है?

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क्या सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए इक्विटी नियम 3(सी) को चुनौती दी गई है?

सारांश

सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए नियम 3(सी) के खिलाफ जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें इसे भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया गया है। जानिए इस मामले के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित प्रभाव।

Key Takeaways

  • यूजीसी के नियम 3(सी) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
  • यह नियम उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए बनाया गया था।
  • याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है।
  • सुप्रीम कोर्ट से इस नियम की संवैधानिक वैधता की जांच की मांग की गई है।
  • यह मामला उच्च शिक्षा में समानता और आरक्षण के बीच बहस को पुनर्जीवित कर सकता है।

नई दिल्ली, 24 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा 13 जनवरी को अधिसूचित प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस नियम को लेकर एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है, जिसमें यूजीसी के नए नियम के नियम 3(सी) को मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रावधान उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर कुछ वर्गों (खासकर सामान्य वर्ग) के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देता है और इससे कुछ समूहों को शिक्षा से बाहर किया जा सकता है। याचिका में कहा गया है कि नियम 3(सी) संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। साथ ही, यह यूजीसी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के विपरीत है और उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करने के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है।

यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कैंपस पर जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों) में इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान है, जो शिकायतों की जांच करेगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई (जैसे डिग्री रोकना, संस्थान की मान्यता रद्द करना आदि) कर सकेगी।

यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118 प्रतिशत बढ़ी हैं। ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार किए गए थे, जहां एक पुरानी याचिका में कैंपस पर भेदभाव रोकने के लिए मजबूत तंत्र की मांग की गई थी। यूजीसी ने 13 जनवरी को इन नियमों को अधिसूचित किया, जिसके बाद कई संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनाने और भेदभाव विरोधी नीति लागू करने के निर्देश दिए गए।

हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना है कि नियम 3(सी) में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा और प्रक्रिया ऐसी है कि यह सामान्य वर्ग के छात्रों/शिक्षकों के खिलाफ पूर्वाग्रही हो सकती है। इसमें झूठी शिकायतों पर कोई सजा का प्रावधान नहीं है, जिससे दुरुपयोग का खतरा है। याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता की जांच करे और छात्रों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे। यह मामला उच्च शिक्षा में समानता और मेरिट बनाम आरक्षण/इक्विटी के बीच बहस को फिर से गरमा सकता है।

Point of View

बल्कि यह उच्च शिक्षा में समानता और भेदभाव के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बहस का हिस्सा है। हमें यह समझने की जरूरत है कि उच्च शिक्षा में सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है। इस प्रकार की याचिकाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं।
NationPress
04/02/2026

Frequently Asked Questions

यूजीसी के नए नियम 3(सी) का क्या उद्देश्य है?
यूजीसी के नए नियम 3(सी) का उद्देश्य उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को समाप्त करना है।
क्या यह नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव करता है?
याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ पूर्वाग्रह को बढ़ावा दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में इस नियम को चुनौती क्यों दी गई है?
इस नियम को चुनौती इसलिए दी गई है क्योंकि इसे असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण बताया गया है।
क्या यूजीसी ने पहले भी ऐसे नियम बनाए हैं?
हाँ, यूजीसी ने ऐसे नियम बनाए हैं, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करना है।
इस मामले का क्या संभावित प्रभाव हो सकता है?
इस मामले का प्रभाव उच्च शिक्षा में समान अवसरों और भेदभाव के खिलाफ नीतियों पर पड़ सकता है।
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