नावी पिल्लै के नोबेल पुरस्कार पर यूएन महासचिव गुटेरेस बोले — 'मानवाधिकार रक्षकों को सच्चा सम्मान'
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 9 अक्टूबर 2026 को भारतीय मूल की पूर्व मानवाधिकार उच्चायुक्त नवानेथेम नावी पिल्लै को मिले नोबेल शांति पुरस्कार को अंतरराष्ट्रीय कानून, विधि के शासन और मानव गरिमा की रक्षा के लिए समर्पित सभी लोगों का सम्मान करार दिया। यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई जब इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसी दिन इस पुरस्कार की सार्वजनिक आलोचना की थी।
गुटेरेस का बयान: कानून की ताकत, बल पर भारी
पिल्लै को बधाई देते हुए गुटेरेस ने कहा, 'उन्होंने दिखाया है कि कानून की ताकत को बल के कानून पर हावी होना चाहिए और मानवाधिकारों की रक्षा ही अन्याय के खिलाफ सबसे पुख्ता सुरक्षा है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह पुरस्कार दुनिया को याद दिलाता है कि 'शांति स्थायी सिद्धांतों पर बननी चाहिए, न कि शक्तिशाली लोगों की इच्छा पर।'
गुटेरेस ने पिल्लै के दशकों के कार्य का विशेष उल्लेख किया — जो दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला और रंगभेद-विरोधी संघर्षकर्ताओं का कानूनी बचाव करने से शुरू हुआ था। उनके अनुसार, पिल्लै 'हमारे समय के कुछ सबसे ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय कानूनी मामलों के बीच न्याय की एक दृढ़, स्वतंत्र आवाज़ रही हैं।'
वर्तमान मानवाधिकार प्रमुख की प्रतिक्रिया
वर्तमान संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने कहा कि यह 'वैश्विक मानवाधिकार आंदोलन के लिए गर्व का क्षण है।' उन्होंने जोड़ा, 'ऐसे समय में जब मानवाधिकारों पर कई मोर्चों पर हमले हो रहे हैं — जिनमें अपार शक्ति रखने वाले लोग भी शामिल हैं — यह पुरस्कार विशेष रूप से मार्मिक है।' टर्क ने पिल्लै को 'अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रतीक' बताया।
पिल्लै का करियर: विवादों से परे एक स्वतंत्र आवाज़
मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर रहते हुए पिल्लै ने मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करने में ऐसी निडरता दिखाई जिससे उन्हें लगभग सभी देशों और सभी पक्षों की आलोचना झेलनी पड़ी। गौरतलब है कि उनकी कार्यसीमा अत्यंत व्यापक रही है — रवांडा नरसंहार से जुड़े मामलों पर अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीश और रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण की अध्यक्ष से लेकर अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग की अध्यक्षता तक।
यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार निकायों की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ हो रही है। पिल्लै की स्वतंत्र कार्यशैली ने उन्हें एक ऐसा व्यक्तित्व बनाया जिसने शक्तिशाली राज्यों के दबाव के बावजूद अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त की।
नेतन्याहू की आलोचना और विरोधाभास
इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस पुरस्कार की आलोचना की, जो उस संदर्भ में उल्लेखनीय है जिसमें पिल्लै ने फिलिस्तीनी क्षेत्र में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच का नेतृत्व किया था। इस विरोध ने नोबेल पुरस्कार को एक बार फिर भू-राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
आगे क्या
नोबेल शांति पुरस्कार का आधिकारिक समारोह परंपरागत रूप से 10 दिसंबर को ओस्लो में आयोजित होता है। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की नज़र इस बात पर होगी कि क्या इस पुरस्कार से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र को नई राजनीतिक ऊर्जा मिलती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ पिल्लै ने सक्रिय भूमिका निभाई।