नवी पिल्ले को नोबेल शांति पुरस्कार 2026: तमिलनाडु के पैतृक गाँव वट्टलगुंडु में परिवार ने मनाया जश्न
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवनेथम 'नवी' पिल्ले को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के पझैया वट्टलगुंडु गाँव में उनके परिजनों के बीच उत्साह और गर्व की लहर दौड़ गई है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने में पिल्ले के योगदान को इस सर्वोच्च सम्मान का आधार बताया। यह खबर उन परिवारों के लिए विशेष रूप से भावनात्मक है जिनकी पीढ़ियाँ देश-विदेश में रहते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहीं।
पैतृक गाँव से गहरा नाता
परिजनों के अनुसार, पिल्ले के पूर्वज 1890 के दशक में रोज़गार की तलाश में पहले श्रीलंका और फिर दक्षिण अफ्रीका चले गए थे। इसके बावजूद परिवार ने पझैया वट्टलगुंडु (जिसे बटलागुंडू भी कहा जाता है) से अपना भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखा।
रिश्तेदार मुथुमणि ने बताया कि पिल्ले उनके दादाजी के बड़े भाई की बेटी थीं। उन्होंने कहा, 'उन्होंने कानून की पढ़ाई की, कई चुनौतियों का सामना किया और बड़ी सफलता हासिल की, जिससे हमारे पूरे परिवार का मान बढ़ा है।' मुथुमणि ने उनके अच्छे स्वास्थ्य और निरंतर सफलता की कामना की।
2007 की यात्रा और पारिवारिक पुनर्मिलन
नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद 2007 में पिल्ले की इस शहर की यात्रा के दौरान ली गई तस्वीरें एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। परिजनों के अनुसार, उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद धार्मिक अनुष्ठान के लिए पहले रामेश्वरम की यात्रा की और फिर पझैया वट्टलगुंडु आकर परिवार से मिलीं।
पिल्ले को अपनी आंटी मानने वाली तिरुपति ने कहा, 'रामेश्वरम की यात्रा के समय हम बहुत छोटे थे, लेकिन परिवार की वे तस्वीरें आज भी बहुत प्यारी हैं। वे यहाँ आईं, सबका हाल-चाल पूछा और जितनी हो सकी, उतनी मदद की।' तिरुपति ने कहा कि इस पुरस्कार से परिवार को गहरी खुशी और गर्व महसूस हो रहा है।
संघर्ष से शिखर तक: नवी पिल्ले का सफर
23 सितंबर 1941 को डरबन में जन्मीं पिल्ले ने गरीबी और रंगभेद के भेदभाव के बीच अपनी ज़िंदगी गढ़ी। उन्होंने नटाल यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की और 1988 में हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की।
1995 में वे दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में नियुक्त होने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनीं — यह ऐतिहासिक नियुक्ति रंगभेद-उत्तर दक्षिण अफ्रीका के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसके बाद उन्होंने रवांडा के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में काम किया।
ऐतिहासिक अकायेसु फैसला और वैश्विक योगदान
रवांडा ट्रिब्यूनल में पिल्ले ने 1998 के ऐतिहासिक अकायेसु फैसले को सुनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई, जिसमें यह अभूतपूर्व रूप से माना गया कि विशेष परिस्थितियों में बलात्कार और यौन हिंसा नरसंहार (जेनोसाइड) के दायरे में आ सकती है। यह अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
गौरतलब है कि पिल्ले की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं है — यह उन तमाम प्रवासी भारतीय परिवारों की कहानी का प्रतिनिधित्व करती है, जिनके पूर्वज उपनिवेशकाल में रोज़गार की तलाश में घर छोड़ गए थे और जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी पहचान बनाई।
तमिल समुदाय में गर्व की भावना
डिंडीगुल में रहने वाले परिजनों के लिए यह वैश्विक पहचान अत्यंत निजी और भावनात्मक महत्व रखती है। कहानियों और तस्वीरों के ज़रिये बना पारिवारिक जुड़ाव अब उनके पुश्तैनी गाँव और व्यापक तमिल समुदाय के लिए गर्व का स्रोत बन गया है। आने वाले समय में पिल्ले की इस उपलब्धि पर स्थानीय स्तर पर सम्मान समारोह आयोजित किए जाने की संभावना है।