क्या नए कानून से भारत के बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी और रीइंश्योरेंस में राहत से मजबूती आएगी?
सारांश
Key Takeaways
- 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति से बीमा कंपनियों को नई पूंजी मिलेगी।
- छोटी और मध्यम कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलेगी।
- नियमों में सरलता से अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित किया जाएगा।
- स्थानीय बीमा कंपनियों की वित्तीय सुरक्षा में वृद्धि होगी।
- विशेष आर्थिक क्षेत्रों में बीमा कंपनियों को छूट प्राप्त होगी।
नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। संसद द्वारा बीमा कानून (संशोधन) विधेयक, 2025 को स्वीकृति मिलने के बाद भारत के बीमा क्षेत्र को महत्वपूर्ण लाभ मिलने की संभावना है। इस नए कानून के तहत अब बीमा कंपनियों में 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी गई है और वैश्विक पुनर्बीमा कंपनियों के लिए नियम भी सरल बनाये गए हैं।
इंश्योरेंस एशिया की रिपोर्ट के अनुसार, इन सुधारों से बीमा कंपनियों को पूंजी आसानी से उपलब्ध होगी, उनकी वित्तीय मजबूती में वृद्धि होगी और बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। इससे विशेष रूप से छोटी और मध्यम बीमा कंपनियों को लाभ होगा और संपूर्ण बीमा तंत्र मजबूत होगा।
इस विधेयक के अनुसार, बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा को 74 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत किया गया है। इसके लिए इस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानूनों में संशोधन किए गए हैं, जिनमें बीमा अधिनियम, 1938, जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 और बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) अधिनियम, 1999 शामिल हैं।
नया नियम ऐसे समय में लागू किया गया है जब बीमा कंपनियों के लिए पूंजी से संबंधित नियम कड़े होते जा रहे हैं। अधिक विदेशी निवेश से कंपनियों पर धन की कमी का दबाव कम होगा और वे अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकेंगी।
केयरएज रेटिंग्स के अनुसार, इस सुधार से बीमा कंपनियों के आपसी संबंध और मजबूत बनने की प्रक्रिया को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे बीमा क्षेत्र और अधिक स्थिर हो सकेगा।
विधेयक में एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब विदेशी पुनर्बीमा कंपनियों के लिए जरूरी न्यूनतम पूंजी को 5,000 करोड़ रुपए से घटाकर 1,000 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत में प्रवेश करना आसान होगा।
इस निर्णय से देश के अंदर पुनर्बीमा की क्षमता और प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि आवश्यक पूंजी भारत में ही रहे, जिससे स्थानीय बीमा कंपनियों को लाभ प्राप्त हो सके।
इस बीच, एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में बीमा क्षेत्र का कार्य संतोषजनक रहने की उम्मीद है। हालांकि, बीमा प्रीमियम में वृद्धि होने की संभावना है, लेकिन जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) घाटे, अधिक कमीशन और नियमों में बदलाव के चलते मुनाफे पर दबाव बने रहने की संभावना है।
पिछले महीने उद्योग संगठनों ने इस विधेयक की सराहना करते हुए कहा कि यह कदम बीमा क्षेत्र में स्पष्टता, भरोसा और दीर्घकालिक पूंजी लाएगा, जिससे लोगों की वित्तीय सुरक्षा मजबूत होगी।
इस विधेयक में विशेष आर्थिक क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों में कार्यरत बीमा कंपनियों को अधिक छूट दी गई है। अब केंद्र सरकार इन क्षेत्रों के लिए अलग बीमा नियम बना सकेगी, जिससे अंतरराष्ट्रीय बीमा गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।