क्या भीमसेन जोशी ने राग भैरव से दिल जीता? बिना टिकट यात्रा से हुई शुरुआत और सुरों से रची अमर विरासत
सारांश
Key Takeaways
मुंबई, २३ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत के जगत के अद्वितीय नायक पंडित भीमसेन जोशी को ख्याल गायकी का सम्राट माना जाता है। वे न केवल अपने अद्भुत सुरों के लिए बल्कि अपनी जीवन यात्रा और दिलचस्प किस्सों के लिए भी जाने जाते हैं। २४ जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है, ऐसे में हम आपको उनके एक रोचक किस्से से परिचित कराते हैं।
संगीत के प्रति उनकी गहरी रुचि इस हद तक थी कि जब वे केवल ११ साल के थे, तब एक बार बिना टिकट यात्रा करते हुए पकड़े गए। उस समय उन्होंने राग भैरव गाकर टीटीई से अपनी मुसीबत टाल दी। उस समय शायद ही कोई जानता था कि यह बच्चा भविष्य में एक महान गायक बनेगा।
भीमसेन जोशी का जन्म ४ फरवरी १९२२ को कर्नाटक के गड़ग जिले में हुआ। उनके माता-पिता ने उन्हें भीमसेन गुरुराज जोशी नाम दिया, लेकिन बाद में वे पंडित भीमसेन जोशी के नाम से जाने गए। बचपन में ही उन्होंने संगीत की ओर झुकाव दिखाया। स्कूल से घर लौटते समय अक्सर वे ट्रांजिस्टर की दुकानों पर रुककर बजते रिकॉर्ड सुनते और उनसे सीखने की कोशिश करते। यह उनके संगीत के प्रति पहला कदम था, जिसने उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सबसे बड़ा नाम बना दिया।
भीमसेन की गुरु की खोज में उनकी यात्रा उनके साहस और संगीत के प्रति समर्पण का प्रमाण है। १९३३ में, सिर्फ ११ वर्ष की उम्र में, वे बिना पैसे के घर छोड़कर संगीत सीखने निकले। जब टीटीई ने उनसे टिकट मांगा, तो भीमसेन ने स्पष्ट कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं।
टीटीई ने जुर्माना लगाने की तैयारी की, तब भीमसेन ने उन्हें राग भैरव सुनाया, जिसे सुनकर टीटीई और अन्य यात्री मंत्रमुग्ध हो गए। उनकी गायकी और आत्मविश्वास ने यात्रियों को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उनका जुर्माना भर दिया और भीमसेन को सम्मानपूर्वक बीजापुर पहुंचा दिया।
भीमसेन की संगीत यात्रा में उनके गुरु सवाई गंधर्व का उल्लेखनीय योगदान रहा। उन्होंने अपने गुरु के घर रहकर कई वर्षों तक तोड़ी, पूरिया, भैरव और यमन जैसी रागों की शिक्षा ली। १९ साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली मंचीय प्रस्तुति दी और अगले वर्ष उनका पहला एल्बम जारी हुआ। इसके बाद वह रेडियो कलाकार के रूप में मुंबई में कार्य करने लगे।
पंडित भीमसेन जोशी का गायन केवल ख्याल तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ठुमरी, तप्पा, भजन और नाट्य संगीत को भी अपनाया और अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। उनके पसंदीदा रागों में यमन, शुद्ध कल्याण, मारुबिहाग, बिहाग, बसंत बहार, मियां मल्हार, अभोगी और दरबारी शामिल थे। उनके सुरों और तानों में गहराई ने लाखों श्रोताओं के दिलों को छू लिया।
उनके योगदान को देश ने हमेशा याद रखा है। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे कई बड़े सम्मान मिल चुके थे। संगीत के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें २००८ में भारत रत्न से भी नवाजा गया। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप और कर्नाटक रत्न जैसे अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए।
पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी कला से न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का नाम रोशन किया। लंबी बीमारी के चलते उन्होंने २४ जनवरी २०११ को पुणे में अंतिम सांस ली। उनकी गायकी ने विभिन्न आयु के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया और उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच अमर बना दिया।