क्या आप जानते हैं सिनेमा के सशक्त सितारे: रहीम चाचा से शंभू काका तक उनकी एक्टिंग के सफर के बारे में?

सारांश
Key Takeaways
- ए.के. हंगल का जीवन स्वतंत्रता संग्राम और सिनेमा का अनूठा मिश्रण है।
- उन्होंने ५२ साल की उम्र में फिल्मी करियर की शुरुआत की।
- उनकी अदाकारी में सादगी और गहराई थी।
- हंगल ने २५० से अधिक फिल्मों में काम किया।
- उन्हें २००६ में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नई दिल्ली, २५ अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। जय-वीरू की जोड़ी हो या गब्बर सिंह, ठाकुर या बसंती, १९७५ में रिलीज़ हुई फिल्म 'शोले' के हर किरदार को आज भी भुलाया नहीं जा सकता। इस फिल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार रहीम चाचा का था, जिनका प्रसिद्ध डायलॉग 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' बहुत चर्चित रहा। इस किरदार को दिग्गज अभिनेता ए.के. हंगल ने जीवंत किया था।
उनका पूरा नाम अवतार किशन हंगल था, जो भारतीय सिनेमा के एक महान व्यक्तित्व थे। सादगी, संवेदनशील अभिनय और गहरी आवाज ने उन्हें लाखों दर्शकों के दिलों में स्थान दिलाया। १ फरवरी १९१४ को सियालकोट में जन्मे हंगल एक उत्कृष्ट अभिनेता, स्वतंत्रता सेनानी और रंगमंच के कलाकार थे।
५२ साल की उम्र में उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की और २५० से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। 'शोले' में उनके रहीम चाचा के किरदार और 'इतना सन्नाटा क्यों है भाई' जैसे संवाद ने उन्हें सिने प्रेमियों के बीच एक विशिष्ट पहचान दी।
अवतार किशन हंगल फिल्मों में आने से पहले एक स्वतंत्रता सेनानी थे। प्रारंभिक दिनों में वे एक दर्जी थे, लेकिन १९२९ से १९४७ के बीच भारत की आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रहे। उन्हें कराची की जेल में तीन साल तक कैद होना पड़ा। जब वे रिहा हुए, तो उन्होंने भारत लौटने का निर्णय लिया।
किताब 'लाइफ एंड टाइम्स ऑफ ए.के. हंगल' में उनके जीवन के अनछुए पहलुओं का उल्लेख है। उनके पिता के करीबी मित्र ने उन्हें दर्जी बनने की सलाह दी थी। इसके बाद हंगल ने इंग्लैंड के एक कुशल दर्जी से यह कला सीखी।
हंगल ने ५२ साल की उम्र में १९६६ में फिल्म 'तीसरी कसम' से करियर का आरंभ किया, जिसमें उन्होंने राज कपूर के बड़े भाई का किरदार निभाया। १९६६ से २००५ तक लगभग २५० हिंदी फिल्मों में काम किया, जिनमें 'शोले' (१९७५), 'नमक हराम', 'आंधी', 'बावर्ची', 'लगान' (२००१) और 'शरारत' (२००२) शामिल हैं।
उन्होंने राजेश खन्ना के साथ १६ फिल्मों में काम किया, जिनमें 'आप की कसम', 'अमर दीप', 'कुदरत' और 'सौतेला भाई' शामिल हैं। उनकी खासियत यह थी कि वे ज्यादातर सकारात्मक किरदारों जैसे पिता, चाचा या बुजुर्ग की भूमिका में नजर आए, लेकिन 'प्रेम बंधन' और 'मंजिल' जैसे कुछ नकारात्मक किरदारों में भी उनकी अदाकारी अद्भुत थी।
२००१ में 'लगान' में शंभू काका और २०१२ में उनकी अंतिम फिल्म 'कृष्णा और कंस' में उग्रसेन की आवाज के लिए उन्हें बहुत सराहा गया।
हंगल ने दूरदर्शन पर भी काम किया। उनकी आखिरी टीवी उपस्थिति २०१२ में 'मधुबाला– एक इश्क एक जुनून' में एक कैमियो के रूप में थी, जो भारतीय सिनेमा के १०० साल पूरे होने की श्रद्धांजलि थी। हंगल ने अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद सिनेमा को नहीं छोड़ा और अंतिम समय तक अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिलों पर राज किया।
तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने ए.के. हंगल को २००६ में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया था। उन्होंने २६ अगस्त २०१२ को इस दुनिया को अलविदा कहा। उनकी सादगी, देशभक्ति और अभिनय के प्रति समर्पण ने उन्हें हिंदी सिनेमा में एक अद्वितीय स्थान दिलाया।