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क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में पुराना श्रेष्ठ है और नया कमतर? संतुलन की तलाश: डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

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क्या दिल्ली शब्दोत्सव 2026 में पुराना श्रेष्ठ है और नया कमतर? संतुलन की तलाश: डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

सारांश

दिल्ली में आयोजित 'शब्दोत्सव 2026' में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने पुरानी और नई परंपराओं में संतुलन पर जोर दिया। उनका कहना है कि हमें अपने अतीत को संजोने के साथ-साथ नए विचारों को भी अपनाना चाहिए। यह संवाद युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है।

मुख्य बातें

पुरानी परंपराओं का संरक्षण आवश्यक है।
नए विचारों को अपनाना भी जरूरी है।
समाज को अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए।
संतुलन समाज की प्रगति का मार्ग है।
युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत।

नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली में आयोजित 'शब्दोत्सव 2026' में साहित्य, संस्कृति और फिल्म क्षेत्र की कई प्रसिद्ध हस्तियों ने भाग लिया। इस अवसर पर फिल्म निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने युवा पीढ़ी, संस्कृति और परंपरा पर अपने विचार रखे।

राष्ट्र प्रेस से बात करते हुए डॉ. द्विवेदी ने कहा, ''पुराना होने से कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं हो जाती और नया होने से कोई वस्तु कमतर नहीं हो जाती।'' अक्सर हमारे मन में अतीत को लेकर यह धारणा बन जाती है कि हमारा अतीत श्रेष्ठ था। यह सच है कि अतीत में हमारी सभ्यता में गहराई और गुणवत्ता थी, लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि सभ्यता समय के साथ विकास के अलग-अलग चरणों से गुजरती है।

उन्होंने कहा, ''आज विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में जहां भारत खड़ा है, वहीं अमेरिका जैसे देश कहीं आगे हैं।'' यही दिखाता है कि पुराने को संजोना महत्वपूर्ण है, लेकिन नए को स्वीकार करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

बातचीत में डॉ. द्विवेदी ने उदाहरण के रूप में हिंदू परंपरा और उसमें आए बदलावों का जिक्र किया। उन्होंने नेजल ऑर्नामेंट का उदाहरण देते हुए कहा, ''बहुत सारी चीजें जो आज हिंदू परंपरा का हिस्सा मानी जाती हैं, वे कभी परंपरा का हिस्सा नहीं थीं।'' रामायण और अन्य प्राचीन काव्यों में स्त्रियों के श्रृंगार और आभूषणों का वर्णन तो मिलता है, लेकिन नेजल ऑर्नामेंट का कहीं उल्लेख नहीं है। फिर भी आज देवी-देवताओं की तस्वीरों में यह दिखाई देता है। इसका मतलब है कि समय के साथ समाज ने इसे स्वीकार कर लिया और यह परंपरा का हिस्सा बन गया।

उन्होंने कहा, ''आज हम जो पहनते हैं और खाते हैं, उसमें बहुत सारी चीजें भारतीय मूल की नहीं हैं।'' उदाहरण के तौर पर, 'कमीज' शब्द और पहनावा भारतीय मूल का नहीं है। हमारी संस्कृति और जीवनशैली में कई संस्कृतियों का मिश्रण हो चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सभी चीजों को अलग करना और सिर्फ पुरानी चीजों पर टिके रहना सही नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि जो हमें अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है, उसे प्राप्त करें, जो प्राप्त हो चुका है, उसे संरक्षित करें, और जो संरक्षित है, उसे संवर्धित करें।

डॉ. द्विवेदी ने कहा, ''यह सिद्धांत केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है।'' यह परंपरा, कर्म और ज्ञान सभी के लिए लागू होता है। समाज को अपनी जड़ें नहीं भूलनी चाहिए, लेकिन नए विचारों और तकनीकों को अपनाने से भी पीछे नहीं रहना चाहिए। यही संतुलन है, जिसे आज की युवा पीढ़ी तलाश रही है। पुराने को संरक्षित करना और नए को स्वीकार करना समाज की प्रगति का रास्ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो न केवल संस्कृति और परंपरा को समझने में मदद करते हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को एक नई दिशा भी प्रदान करते हैं। हमें अपने अतीत के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य को भी समझने की आवश्यकता है।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शब्दोत्सव 2026 कब हुआ?
शब्दोत्सव 2026 का आयोजन 4 जनवरी 2026 को हुआ।
डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि पुराना होना श्रेष्ठता नहीं है और नया होना कमतर नहीं है। संतुलन आवश्यक है।
हिंदू परंपरा में बदलावों का क्या उदाहरण दिया गया?
डॉ. द्विवेदी ने नेजल ऑर्नामेंट का उदाहरण दिया, जो आज परंपरा का हिस्सा है लेकिन पहले नहीं था।
राष्ट्र प्रेस
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