राज कपूर का इंतज़ार: रवींद्र जैन की सफलता की अनकही कहानी
सारांश
Key Takeaways
- रवींद्र जैन का संघर्ष और धैर्य सफलता की कुंजी है।
- राज कपूर के साथ काम करने का सपना पूरा हुआ।
- उनकी पहली फिल्म 'कांच और हीरा' थी।
- फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' ने उन्हें पहचान दिलाई।
- संगीत में मेहनत और लगन का महत्व।
मुंबई, 27 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। हिंदी फिल्म जगत के संगीत के दिग्गज रवींद्र जैन की कहानी एक संघर्षपूर्ण यात्रा रही है। उन्होंने शुरुआत में अनेक फिल्मों में संगीत दिया, लेकिन उनका सपना था कि वे राज कपूर के साथ काम करें। उन्होंने कई बार कहा कि वे राज कपूर से मिलते रहे, फोन करते रहे और अपने काम की जानकारी साझा करते रहे।
एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि राज कपूर ने हमेशा कहा, ''जब सही समय आएगा, मैं तुम्हें मौका दूंगा। बस काम करते रहो।'' रवींद्र जैन लगातार काम करते रहे और राज कपूर के एक कॉल का इंतज़ार करते रहे।
कई वर्षों बाद, राज कपूर ने रवींद्र जैन को पुणे में अपनी जन्मदिन की पार्टी में आमंत्रित किया। वहाँ रवींद्र ने जब 'सुन साहिबा सुन' गाना गाया, तो राज कपूर के चेहरे पर खुशी झलक आई और उन्होंने कहा, ''तुम मेरी अगली फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' के लिए संगीत देंगे।''
यह पल रवींद्र जैन के करियर के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' की कहानी और इसके गाने दोनों ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इस फिल्म के लिए रवींद्र जैन को फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार मिला।
रवींद्र जैन का जन्म 28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ में हुआ था। उनके पिता ने उन्हें बचपन में ही घर पर संगीत सिखाया। लेकिन, ऑडिशन के दौरान उन्हें देश के पांच रेडियो स्टेशनों द्वारा नकार दिया गया। उनके जीवन में बदलाव तब आया जब गुरु राधे श्याम झुनझुनवाला ने उन्हें एक फिल्म में काम करने का अवसर दिया और 1969 में मुंबई ले आए।
रवींद्र जैन ने 14 जनवरी 1971 को राधेश्याम झुनझुनवाला की फिल्म 'लोरी' के लिए अपना पहला गीत रिकॉर्ड कराया। मोहम्मद रफी द्वारा गाए इस गीत के बोल थे ‘ये सिलसिला है प्यार का चलता ही रहेगा।' इसके बाद लोरी के लिए रवींद्र जैन ने लता मंगेशकर से चार गीत और एक गीत लता और आशा से गवाया। लेकिन, राधे श्याम फिल्म पूरी नहीं कर पाए।
रवींद्र जैन के संगीत निर्देशन में पहली रिलीज़ फिल्म 'कांच और हीरा' (1972) थी। इसमें रवींद्र जैन ने एक गीत गवाया, जिसके बोल थे ‘नजर आती नहीं मंजिल'। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाई, लेकिन रवींद्र जैन के काम की प्रशंसा हुई। इसके बाद उन्होंने 'सौदागर', 'चोर मचाए शोर', 'चित चोर', 'तपस्या', 'हम नहीं सुधरेंगे', 'खून खराबा', 'प्रतिशोध', 'ये कैसा इंसाफ', 'कहानी फूलवती की', 'मुझे कसम है', 'माटी बलिदान की', 'गुलामी की जंजीर' जैसी कई फिल्मों में काम कर अपनी पहचान बनाई।