श्रवण कुमार राठौर: नदीम के साथ मिलकर हिंदी फिल्म संगीत को नई दिशा देने वाला संगीतकार
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई, 21 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। श्रवण कुमार राठौर भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम थे, जो प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी 'नदीम-श्रवण' का अहम हिस्सा रहे हैं। उन्होंने 1990 के दशक में हिंदी फिल्म संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और कई हिट फिल्मों में सुंदर और भावनात्मक संगीत की रचना की। उनकी धुनों की विशेषता सादगी, दिल को छू लेने वाली मेलोडी और शास्त्रीय संगीत की झलक थी। आशिकी, साजन और दीवाना जैसी फिल्मों के संगीत आज भी श्रोताओं के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं। श्रवण ने अपने संगीत के माध्यम से एक संपूर्ण युग को परिभाषित किया और भारतीय फिल्म संगीत पर एक अमिट छाप छोड़ी। श्रवण कुमार राठौर ने 22 अप्रैल 2021 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
श्रवण कुमार राठौर का जन्म 13 नवंबर 1954 को मुंबई में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके पिता, पं. चतुर्भुज राठौर, एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। संगीत के इस वातावरण में पले-बढ़े श्रवण ने बचपन से ही सुरों की गहराई को समझना शुरू कर दिया था। उनके भाई रूप कुमार राठौर और विनोद राठौर भी भारतीय संगीत के प्रमुख कलाकार हैं। श्रवण ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी जिसका प्रभाव उनके फिल्मी गीतों में स्पष्ट था।
नदीम अख्तर सैफी और श्रवण की मित्रता 1973 में एक समारोह के दौरान हुई थी। इस जोड़ी की पहली भोजपुरी फिल्म 'दंगल' थी, जिसमें मन्ना डे द्वारा गाया गया प्रसिद्ध भोजपुरी गीत "कशी हिले, पटना हिले" था। 1981 में रिलीज़ हुई उनकी पहली हिंदी फिल्म 'मैंने जीना सीख लिया' थी, जिसमें अमित कुमार का गाना था। नदीम-श्रवण की जोड़ी को असली पहचान 1990 में आई फिल्म 'आशिकी' से मिली। इस फिल्म का गीत 'मैं दुनिया भुला दूंगा... धीरे-धीरे से... सांसों की जरूरत…' आज भी लोगों का पसंदीदा है। इस फिल्म के संगीत ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और रातों-रात इस जोड़ी को सुपरस्टार बना दिया। इसके बाद इस जोड़ी ने एक के बाद एक सुपरहिट गाने प्रस्तुत किए जो आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।
श्रवण राठौर के संगीत की विशेषता उनकी सादगी और मधुरता थी। उन्होंने पश्चिमी वाद्ययंत्रों (जैसे सिंथेसाइज़र) के साथ भारतीय शास्त्रीय वाद्ययंत्रों जैसे कि तबला, ढोलक और बांसुरी का अद्भुत मिश्रण किया। उनके संगीत में रूहानियत और मेलोडी का ऐसा संगम था कि लोग उन्हें बार-बार सुनना पसंद करते थे। नदीम-श्रवण के संगीत ने उस समय मेलोडी को पुनर्जीवित किया, जब बॉलीवुड में शोर-शराबे वाले संगीत का चलन बढ़ रहा था।
फिल्म साजन (1991) में 'देखा है पहली बार' और 'जीए तो जीए कैसे' जैसे गीतों ने धूम मचा दी। फिल्म दीवाना (1992) में शाहरुख़ ख़ान की पहली फिल्म को संगीत ने एक अलग ऊंचाई दी। राजा हिंदुस्तानी (1996) में 'परदेसी परदेसी' आज भी शादियों और महफिलों की जान है। फिल्म धड़कन (2000) के संगीत में भावनात्मक गहराई का एक बेहतरीन उदाहरण मिलता है। नदीम-श्रवण को आशिकी (1991), साजन (1992), दीवाना (1993), और राजा हिंदुस्तानी (1997) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक अवार्ड मिला था।
संगीत की दुनिया का यह चमकता सितारा श्रवण कुमार राठौर 22 अप्रैल 2021 को कोरोना वायरस से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हमेशा के लिए शांत हो गया। उनके निधन से बॉलीवुड ने एक ऐसा स्तंभ खो दिया, जिसने भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्ण युग को पुनर्जीवित किया था।