'धुरंधर' ने बदली बॉलीवुड की सोच: मुकेश छाबड़ा बोले, अब लोग फिल्म की लंबाई नहीं, कहानी पर करते हैं बात
सारांश
मुख्य बातें
कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने हाल ही में अभिनेता शेखर सुमन के चैट शो 'शेखर टोनाइट' पर दिए एक साक्षात्कार में खुलासा किया कि आदित्य धर निर्देशित फिल्म 'धुरंधर' ने बॉलीवुड में फिल्मों की अवधि को लेकर पुरानी सोच को बदलकर रख दिया है। छाबड़ा के अनुसार, चार घंटे की इस फिल्म ने दर्शकों को इस कदर बांधे रखा कि उद्योग अब लंबाई की बजाय कथावस्तु की गुणवत्ता पर ज़ोर देने लगा है।
मुकेश छाबड़ा ने क्या कहा
छाबड़ा ने शो में कहा, 'कहानी में दम होना बेहद ज़रूरी है और मैंने हाल ही में एक मीम देखा था कि आज हम जहाँ हर सेकंड रील बदलते रहते हैं, वहाँ धुरंधर ने दर्शकों को चार घंटे तक बाँधकर रखा और फिल्म देखने के दौरान किसी ने अपना फ़ोन तक नहीं छुआ।' उन्होंने आगे जोड़ा, 'अब लोग मुझसे फिल्म की लंबी अवधि के बजाय उसकी कहानी पर बात करना पसंद करते हैं। वे अब यह नहीं कहते कि कहानी को छोटा करो, एक और गाना डाल दो। मैंने समझा — अगर आपके पास कन्विक्शन है, तो बात बन जाएगी।'
आदित्य धर को सबसे बड़ा श्रेय
छाबड़ा ने इस बदलाव के केंद्र में निर्देशक आदित्य धर को रखा। उन्होंने कहा, 'उनमें सबसे बड़ी खासियत यह है कि वो सिर्फ अपनी सुनते हैं, किसी और की नहीं। वह इतने शांत और खुद को लेकर इतने पक्के हैं कि किसी और के मन में भी अपने को लेकर राय बदल देते हैं।' छाबड़ा के अनुसार, आदित्य अपनी छवि को लेकर दूसरों की राय बदलने में वक़्त नष्ट नहीं करते — उनके भीतर का आत्मविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
रणवीर सिंह की तारीफ
कास्टिंग डायरेक्टर ने अभिनेता रणवीर सिंह की भी जमकर सराहना की, जिन्होंने फिल्म में हमजा अली मजारी का किरदार निभाया है। छाबड़ा ने कहा, 'हमजा का किरदार निभाने के लिए रणवीर को भी सलाम — उन्होंने उस किरदार में जान डाल दी। मैंने देखा कि सेट पर वे 80 के दशक की तरह थे।'
फिल्म की पृष्ठभूमि और स्टारकास्ट
निर्देशक आदित्य धर की फिल्म 'धुरंधर' भू-राजनीतिक तनाव, गैंगवार और गुप्त अभियानों की पृष्ठभूमि पर बनी एक जासूसी और क्राइम ड्रामा है। रणवीर सिंह के अलावा, इस फिल्म में अक्षय खन्ना (गैंगस्टर रहमान डकैत के रूप में), संजय दत्त, आर. माधवन और अर्जुन रामपाल भी अहम भूमिकाओं में हैं। यह स्टार-स्टडेड कास्ट अपने आप में बॉलीवुड की बड़ी परियोजनाओं में से एक का संकेत देती है।
बॉलीवुड पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती पहुँच और शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट की आदत ने थियेटर जाने वाले दर्शकों की सहनशक्ति पर सवाल खड़े किए हैं। गौरतलब है कि 'धुरंधर' जैसी लंबी फिल्मों की सफलता यह संकेत देती है कि दर्शक अवधि से नहीं, गुणवत्ता से ऊबते हैं। उद्योग जगत के लिए यह एक महत्वपूर्ण सबक है — सही कहानी सुनाई जाए, तो दर्शक घंटों तक स्क्रीन से नज़र नहीं हटाते। आने वाले समय में यह बदलाव बड़े बजट की हिंदी फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है।