क्या जावेद अख्तर को रफी साहब के लिए गीत न लिख पाने का मलाल है?

सारांश
Key Takeaways
- रफी साहब की आवाज़ हमेशा लोगों के दिलों में बसी है।
- जावेद अख्तर का रफी साहब के लिए गीत न लिख पाना एक बड़ा मलाल है।
- समाज में कलाकारों को सम्मान देने की आवश्यकता है।
- पुराने गायक और उनकी आवाज़ों का जादू अद्वितीय होता है।
- नई प्रतिभाएं पुरानी परंपराओं को चुनौती देती हैं।
मुंबई, 31 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। शनिवार को मुंबई में आयोजित रूह-ए-रफी कार्यक्रम में महान गायक मोहम्मद रफी को श्रद्धांजलि दी गई। इस कार्यक्रम का आयोजन प्रसिद्ध संगीतकार और लेखक राजेश धाबरे ने किया था, जिसमें कई नामचीन शख्सियतें शामिल हुईं। जावेद अख्तर ने अपनी दिली ख्वाहिश का इजहार किया, जबकि अभिनेता जितेंद्र ने उस समय के कलाकारों को याद किया।
कार्यक्रम में पद्मश्री पुरस्कार विजेता जावेद अख्तर और अनुभवी अभिनेता जितेंद्र मुख्य अतिथि थे। जावेद ने कहा कि रफी साहब के लिए लिखने का सपना अधूरा रह गया।
कार्यक्रम के बाद, जितेंद्र और जावेद साहब ने मीडिया से बात की। जावेद अख्तर ने कहा, "एक सभ्य समाज कलाकारों को याद करता है और उन्हें सम्मान देता है। रफी साहब की आवाज लोगों के दिलों में पहले से ही अपनी पहचान बना चुकी है। मुझे इस बात की खुशी है।"
जब जावेद से उनके पसंदीदा रफी गीतों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि सारे गाने पसंद हैं, लेकिन 'जाग दिल-ए-दीवाना', 'मेरी दुनिया में तुम आई', 'साथी ना कोई मंजिल' और 'हुई शाम उनका ख्याल आ गया' जैसे गानों का नाम लिया।
जावेद ने आगे कहा, "यह मेरी बदकिस्मती थी कि मैंने उनके जीवित रहते गीत लिखना शुरू नहीं किया। अब भी मेरे दिल में यही इच्छा है कि काश रफी साहब मेरा गाना गाते।"
अभिनेता जितेंद्र ने रफी के बारे में अपने विचार साझा करते हुए कहा, "एक समय था जब हमारे पास केवल 4-5 गायक होते थे। लेकिन अब देश में इतनी प्रतिभा है कि यह एक चुन-चुन कर काम करने वाली परंपरा बन गई है। लता जी, आशा जी, रफी साहब और किशोर साहब का जादू वापस लाना मुश्किल है।"