एम.एफ. हुसैन जयंती: मुक्तिबोध के दर्द ने छुड़ाए जूते, नंगे पैरों की अनकही कहानी
सारांश
मुख्य बातें
मकबूल फिदा हुसैन — भारतीय आधुनिक कला के सबसे बड़े नामों में से एक — का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था। उनकी पहचान सिर्फ उनकी रंगीन और भावपूर्ण पेंटिंग्स से नहीं, बल्कि उनके नंगे पैरों से भी थी — एक आदत जो किसी नियम से नहीं, बल्कि एक कवि के प्रति गहरे सम्मान से जन्मी थी। 16 सितंबर 2026 को उनकी जयंती की पूर्वसंध्या पर, उनसे जुड़ा यह किस्सा एक बार फिर चर्चा में है।
बचपन और कला की शुरुआत
हुसैन का बचपन इंदौर में बीता। बेहद छोटी उम्र में उन्होंने अपनी माँ को खो दिया — एक ऐसी कमी जिसकी छाया उनके पूरे जीवन पर पड़ी। हुसैन ने स्वयं एक बातचीत में बताया था कि माँ का निधन इतनी छोटी उम्र में हुआ कि उनसे जुड़ी यादें धुंधली हैं। शायद इसी वजह से उनकी पेंटिंग्स में महिलाओं और माँ की छवि एक अलग, गहरी संवेदनशीलता के साथ उभरती थी।
1930 के दशक में जब हुसैन मुंबई पहुँचे, तो उनके पास कला का हुनर था लेकिन साधन सीमित थे। उन्होंने उस दौर में फिल्मों के बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर हाथ से बनाकर अपना गुजारा किया — यह वह दौर था जब सिनेमा के विज्ञापन की दुनिया पूरी तरह हस्तनिर्मित कला पर टिकी थी।
प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप और अंतरराष्ट्रीय पहचान
1947 में हुसैन उन अग्रणी कलाकारों में शामिल हुए जिन्होंने प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की स्थापना की। इस समूह का उद्देश्य भारतीय कला को आधुनिक वैश्विक प्रवाहों से जोड़ना था। उनकी पेंटिंग्स में भारतीय संस्कृति, आम जीवन, धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों का आधुनिक शैली में संगम दिखने लगा।
1950 और 1960 के दशक में उनकी कृतियाँ देश-विदेश की प्रदर्शनियों में जगह पाने लगीं। 1959 में टोक्यो बिएनाले में उन्हें पुरस्कार मिला और 1971 में उन्हें महान चित्रकार पाब्लो पिकासो के साथ साओ पाउलो बिएनाले में आमंत्रित किया गया — एक उपलब्धि जो किसी भी भारतीय कलाकार के लिए दुर्लभ थी।
मुक्तिबोध का दर्द और नंगे पैरों की कहानी
हुसैन के नंगे पैर चलने की आदत को लेकर लोगों में हमेशा जिज्ञासा रही। इसके पीछे की असली वजह हिंदी के महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध से जुड़ी है। हुसैन कविता के गहरे प्रेमी थे और मुक्तिबोध को वे असाधारण प्रतिभा का कवि मानते थे।
मुक्तिबोध के निधन के बाद हुसैन उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि लौटते वक्त उनके मन में यह बात कसकती रही कि इतने बड़े कवि को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इसी पीड़ा में, मई की चिलचिलाती गर्मी में, उन्होंने अपने जूते उतार दिए और तारकोल की तपती सड़क पर नंगे पैर चल पड़े। उनके अपने शब्दों में, यह मुक्तिबोध के दर्द को अपने भीतर महसूस करने की कोशिश थी। इसके बाद यह आदत उनकी स्थायी पहचान बन गई।
सिनेमा में कदम और पुरस्कार
हुसैन की रचनात्मकता पेंटिंग की सीमाओं से परे भी फैली। 1967 में उन्होंने 'थ्रू द आइज़ ऑफ ए पेंटर' नाम की फिल्म बनाई, जिसमें राजस्थान के जीवन और रंगों को उनके अपने नजरिए से दर्शाया गया। इस फिल्म को प्रतिष्ठित बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्होंने 'गजगामिनी' और 'मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज़' जैसी फिल्में भी बनाईं।
उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। 1966 में पद्म श्री, 1973 में पद्म भूषण और 1991 में पद्म विभूषण से वे अलंकृत किए गए। घोड़ों पर बनाई उनकी पेंटिंग्स विशेष रूप से प्रसिद्ध हुईं।
विवाद, निर्वासन और विरासत
उनकी कला को लेकर विवाद भी कम नहीं रहे। धमकियों और कानूनी मामलों के बीच 2006 के बाद वे भारत से बाहर रहने लगे और बाद में कतर की नागरिकता स्वीकार की। 9 जून 2011 को लंदन में 95 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। गौरतलब है कि भारत की मिट्टी में पला यह कलाकार अपनी अंतिम साँस विदेश में लेने को मजबूर हुआ — एक ऐसा अंत जो आज भी भारतीय कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस को जीवित रखता है।