सज्जाद हुसैन जयंती: अरबी और हिंदुस्तानी सुरों के संगम से फिल्म संगीत को नई पहचान देने वाले उस्ताद
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में 15 जून का दिन विशेष महत्व रखता है — यह उस संगीतकार का जन्मदिन है जिसने जटिल सुरों को मधुरता में पिरोने की एक अनूठी कला विकसित की। सज्जाद हुसैन का जन्म 15 जून 1917 को हुआ था और उन्होंने अरबी संगीत की बारीकियों तथा हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की राग-रागनियों को ऐसे सम्मिश्रित किया कि हिंदी फिल्म संगीत को एक सर्वथा नई दिशा मिली। उनकी रचनाएँ आज भी संगीत प्रेमियों के मन में गूँजती हैं और नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरणा देती हैं।
संगीत साधना: सुर एक तपस्या थी
सज्जाद हुसैन उस स्वर्णिम युग के संगीतकार थे जब हर धुन को साधना एक गहरी तपस्या के समान थी। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि एक आत्मिक साधना था। यही कारण था कि उनकी रचनाएँ अक्सर जटिल होती थीं, परंतु उनमें एक ऐसी मिठास होती थी जो श्रोता को बाँध लेती थी। उन्होंने कभी भी संगीत को सहज और सरल रास्ते से नहीं देखा।
उनकी विशेषता यह थी कि वे अरबी शैली के संगीत-खंडों को अपने अंदाज़ में ढालते थे और साथ ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय परंपरा की राग-रागनियों का भी सुविचारित उपयोग करते थे। यह संगम किसी साधारण प्रयोग का परिणाम नहीं था — यह उनकी गहरी संगीत-समझ और वर्षों की साधना का प्रतिफल था। उन्होंने संगीत को सीमाओं में नहीं बाँधा, बल्कि उसे खुला आकाश दिया।
समकालीनों से अलग राह
सज्जाद हुसैन की रचनात्मकता इतनी विशिष्ट थी कि वे अपने समकालीन संगीतकारों से सर्वथा भिन्न एक राह पर चलते थे। जैसे हिंदी कविता में शमशेर बहादुर सिंह का अपना स्वर था और शास्त्रीय संगीत में उस्ताद अमीर खाँ का अपना मार्ग, उसी प्रकार सज्जाद हुसैन भी अपनी ही धुनों की एक अलग दुनिया बसाते थे। उनकी धुनें कभी सरल नहीं थीं, लेकिन जब वे समझ में आती थीं तो लंबे समय तक मन में गूँजती रहती थीं।
वे मैंडोलिन, गिटार, वायलिन, पियानो, क्लैरिनेट और एकॉर्डियन — हर वाद्य यंत्र पर समान अधिकार रखते थे। उनकी धुनों में तान, मुरकी और मींड का ऐसा उपयोग होता था जो संगीत को एक नया आयाम देता था।
यादगार फिल्में और अमर गीत
संगदिल, सैयां, हलचल, खेल और रुस्तम-ए-सोहराब जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी मिसाल माना जाता है। इन फिल्मों के गीत केवल धुनें नहीं थे, बल्कि भावनाओं की गहराई को छूने वाले अनुभव थे। 1944 की फिल्म 'दोस्त' में नूरजहाँ के साथ उनका काम और 'बदनाम मोहब्बत कौन करे' जैसा गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में ज़िंदा है।
'ऐ दिलरुबा नज़रें मिला' और 'वो तो चले गए, ऐ दिल' जैसे गीत उनकी असाधारण प्रतिभा के प्रमाण हैं। उनकी धुनों को गाना हर किसी के बस की बात नहीं थी — इसके लिए असाधारण तकनीकी दक्षता और भावनात्मक गहराई दोनों की आवश्यकता होती थी।
लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि
स्वर-कोकिला लता मंगेशकर सज्जाद हुसैन को अपने करियर के सबसे विशेष संगीतकारों में गिनती थीं। उन्होंने स्वयं कहा था कि सज्जाद साहब जैसा संगीत किसी और ने नहीं बनाया। यह स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि उनकी रचनाएँ तकनीकी दृष्टि से भी कितनी उच्च कोटि की थीं।
विरासत और प्रभाव
सज्जाद हुसैन का स्वभाव उतना ही अनूठा था जितना उनका संगीत। वे अपने काम के प्रति बेहद गंभीर और कई बार अत्यंत कठोर भी माने जाते थे। कहा जाता है कि वे बहुत कम गायकों को अपने संगीत के लिए उपयुक्त मानते थे — परंतु यही कठोरता उनकी कला की शुद्धता को अक्षुण्ण बनाए रखती थी। भारतीय फिल्म संगीत की यह अमूल्य विरासत आज भी नई पीढ़ी के संगीतकारों और श्रोताओं को समान रूप से प्रेरित करती है।