18 अगस्त 2026
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उस्ताद अब्दुल रशीद खान: कुश्ती छोड़ सुरों को चुना, बने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान स्तंभ

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उस्ताद अब्दुल रशीद खान: कुश्ती छोड़ सुरों को चुना, बने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान स्तंभ

सारांश

एक पिता का अल्टीमेटम, एक बालक का निर्णय — और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को मिला एक महान स्तंभ। उस्ताद अब्दुल रशीद खान ने कुश्ती छोड़ सुरों को चुना और 107 वर्ष की आयु तक संगीत-साधना करते रहे। उनकी जीवन-गाथा समर्पण और अनुशासन की अमर मिसाल है।

मुख्य बातें

उस्ताद अब्दुल रशीद खान का जन्म 19 अगस्त 1908 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश के सलोन कस्बे में हुआ था।
पिता के अल्टीमेटम पर उन्होंने कुश्ती छोड़कर संगीत को चुना — यह निर्णय उनकी जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बना।
ग्वालियर घराने की परंपरा में दीक्षित; खयाल , ध्रुपद , धमार और ठुमरी में महारत हासिल की।
आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में दीर्घकाल तक शिक्षक रहे; आकाशवाणी और दूरदर्शन के नियमित कलाकार।
वर्ष 2012 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया — सम्मान पाने वाले सबसे अधिक उम्र के व्यक्तियों में शामिल।
18 फरवरी 2016 को कोलकाता में 107 वर्ष की आयु में निधन।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अप्रतिम साधक उस्ताद अब्दुल रशीद खान की जीवन-यात्रा केवल एक कलाकार की कहानी नहीं है — यह उस निर्णायक पल की कहानी है जब एक पिता के अल्टीमेटम ने एक बालक को कुश्ती के अखाड़े से उठाकर संगीत के आसमान पर बिठा दिया। 19 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सलोन कस्बे में एक संगीत परिवार में जन्मे अब्दुल रशीद खान ने अपने सुरों से कई पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध किया और 107 वर्ष की आयु तक संगीत की सेवा करते रहे।

बचपन का द्वंद्व: अखाड़ा या रियाज़

बहुत कम लोग जानते हैं कि बालक अब्दुल रशीद को कुश्ती का उतना ही जुनून था जितना सुरों का। उस दौर में उत्तर प्रदेश के पहलवान पूरे देश में विख्यात थे और अखाड़े की दुनिया उन्हें खींचती थी। किंतु उनके पिता को एक गहरी चिंता सताती थी — कुश्ती के दाँव-पेच से गर्दन या गले पर चोट लग सकती है, जो एक गायक की आवाज़ को हमेशा के लिए नुकसान पहुँचा सकती है। अंततः पिता ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया: कुश्ती और संगीत में से एक चुनो। अब्दुल रशीद खान ने बिना हिचकिचाहट सुरों का रास्ता चुना — और यही निर्णय उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

गुरुओं की छाया में संगीत-साधना

सुर और राग के बीच पले-बढ़े अब्दुल रशीद खान ने अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। इसके बाद चांद खान, बरखुदार खान और मेहताब खान जैसे विद्वान गुरुओं ने उन्हें तालीम दी। बताया जाता है कि वे रात में कई-कई घंटे रियाज़ करते थे — एक ऐसी साधना जो दशकों तक अनवरत चलती रही। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने की परंपरा स्पष्ट झलकती थी, परंतु उन्होंने अपनी एक विशिष्ट शैली भी विकसित की जो उन्हें समकालीनों से अलग करती थी।

संगीत की विविध विधाओं में महारत

खयाल गायकी के अतिरिक्त उस्ताद अब्दुल रशीद खान ने ध्रुपद, धमार और ठुमरी जैसी विधाओं में भी असाधारण दक्षता अर्जित की। वे केवल गायक नहीं, बल्कि एक सिद्धहस्त रचनाकार और कवि भी थे। उनकी अनेक मौलिक रचनाओं को आकाशवाणी और अन्य सांस्कृतिक संस्थानों ने संरक्षित किया है। कोलकाता की आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में उन्होंने दीर्घकाल तक शिक्षक के रूप में सेवाएँ दीं और अनगिनत शिष्यों को शास्त्रीय संगीत की बारीकियाँ सिखाईं। आकाशवाणी और दूरदर्शन के नियमित कलाकार के रूप में उनकी प्रस्तुतियाँ देशभर के श्रोताओं तक पहुँचती रहीं।

सम्मान और पुरस्कार

उनके अतुलनीय योगदान को राष्ट्रीय और संस्थागत स्तर पर व्यापक मान्यता मिली। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी सम्मान, बंग विभूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा गया। वर्ष 2012 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। वे इस सम्मान को पाने वाले सबसे अधिक उम्र के व्यक्तियों में शुमार थे — एक ऐसा तथ्य जो उनकी दीर्घ साधना और अटूट समर्पण का प्रमाण है।

विरासत और अंतिम विदाई

18 फरवरी 2016 को कोलकाता में 107 वर्ष की आयु में उस्ताद अब्दुल रशीद खान ने इस दुनिया से विदा ली। उल्लेखनीय यह है कि अंतिम दिनों तक वे अपने शिष्यों को तालीम देते रहे और मंच पर प्रस्तुति देते रहे — उम्र उनके संगीत-प्रेम को कभी कम न कर सकी। उनकी विरासत आज भी उनके शिष्यों की गायकी और संरक्षित रिकॉर्डिंग्स के माध्यम से जीवित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उस्ताद अब्दुल रशीद खान कौन थे?
उस्ताद अब्दुल रशीद खान हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित गायक थे, जिनका जन्म 19 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सलोन कस्बे में हुआ था। ग्वालियर घराने की परंपरा में दीक्षित इस महान कलाकार ने खयाल, ध्रुपद, धमार और ठुमरी में असाधारण दक्षता अर्जित की।
उस्ताद अब्दुल रशीद खान ने कुश्ती क्यों छोड़ी?
बचपन में उन्हें संगीत के साथ-साथ कुश्ती का भी गहरा शौक था। उनके पिता को आशंका थी कि कुश्ती से गर्दन या गले पर चोट लग सकती है, जिससे गायकी प्रभावित होगी। पिता के अल्टीमेटम पर उन्होंने संगीत को चुना और यही निर्णय उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
उस्ताद अब्दुल रशीद खान को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी सम्मान और बंग विभूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। वर्ष 2012 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया और वे यह सम्मान पाने वाले सबसे अधिक उम्र के व्यक्तियों में शामिल थे।
उस्ताद अब्दुल रशीद खान का निधन कब और कहाँ हुआ?
18 फरवरी 2016 को कोलकाता में 107 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। अंतिम दिनों तक वे अपने शिष्यों को तालीम देते रहे और मंच पर प्रस्तुतियाँ देते रहे।
उस्ताद अब्दुल रशीद खान ने किन गुरुओं से संगीत सीखा?
उन्होंने अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। इसके बाद चांद खान, बरखुदार खान और मेहताब खान जैसे विद्वान गुरुओं ने उन्हें तालीम दी। बाद में उन्होंने कोलकाता की आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में शिक्षक के रूप में भी सेवाएँ दीं।
राष्ट्र प्रेस
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