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मास्टर सलीम: 6 साल की उम्र में शुरू हुई सुरों की साधना, पिता की सख्त तालीम ने बनाया सूफी संगीत का सितारा

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मास्टर सलीम: 6 साल की उम्र में शुरू हुई सुरों की साधना, पिता की सख्त तालीम ने बनाया सूफी संगीत का सितारा

सारांश

जालंधर के शाहकोट से निकले सलीम शहजादा ने 6 साल की उम्र में पिता उस्ताद पूरन शाह कोटी से सुरों की तालीम ली। मंच पर सुर भटकने पर मिली डांट जीवन की सबसे बड़ी सीख बनी। 7 साल में दूरदर्शन पर प्रस्तुति, 10 साल में पहला एल्बम — और आज 'मास्टर सलीम' नाम है सूफी संगीत का पर्याय।

मुख्य बातें

मास्टर सलीम (सलीम शहजादा) का जन्म 13 जुलाई 1980 को शाहकोट, जालंधर, पंजाब में हुआ।
मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता उस्ताद पूरन शाह कोटी ने शास्त्रीय व सूफियाना संगीत की तालीम दी।
7 वर्ष की आयु में बठिंडा दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में 'चरखे दी घूक' की प्रस्तुति पर मिली 'मास्टर' की उपाधि।
1990 में 10 वर्ष की आयु में पहला आधिकारिक एल्बम 'चरखे दी घूक' सुर ताल लेबल से जारी।
संगीतकार शंकर महादेवन की पहल पर 2007 में फिल्म 'हे बेबी' के गाने 'मस्त कलंदर' से बॉलीवुड में एंट्री।
2014 में अनमोल अलीशा सलीम से विवाह; 2021 में 'वॉयस ऑफ पंजाब सीजन 12' में मुख्य निर्णायक।

पंजाब के जालंधर के एक छोटे-से कस्बे शाहकोट से निकले सलीम शहजादा, जिन्हें आज दुनिया 'मास्टर सलीम' के नाम से जानती है, भारतीय सूफी और भक्ति संगीत के उन विरले कलाकारों में से हैं जिन्होंने गायकी को महज़ पेशा नहीं, बल्कि एक रूहानी साधना का दर्जा दिया। मात्र 6 वर्ष की आयु में उनके पिता और प्रख्यात सूफी गायक उस्ताद पूरन शाह कोटी ने उन्हें शास्त्रीय और सूफियाना संगीत की बारीकियाँ सिखानी शुरू कर दी थीं।

पिता की डांट बनी जीवन की सबसे बड़ी सीख

लखनऊ में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम 'देशज' के दौरान मास्टर सलीम ने स्वयं एक मार्मिक किस्सा साझा किया था। बचपन में एक मंच प्रस्तुति के दौरान जब उनका सुर भटका, तो उनके पिता ने दर्शकों के सामने ही उन्हें टोका। जब यही गलती अगली प्रस्तुति में दोहराई गई, तो उस्ताद पूरन शाह कोटी ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी — 'सही गाओ, वरना परिणाम अच्छे नहीं होंगे।' आज वैश्विक मंचों पर अपनी गायकी का लोहा मनवाने वाले मास्टर सलीम बड़ी कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं कि उनके पिता के इसी अनुशासन और सख़्त तालीम ने उन्हें सुरों के शिखर तक पहुँचाया।

बाल कौतुक से राष्ट्रीय पहचान तक

13 जुलाई 1980 को शाहकोट, जालंधर में जन्मे मास्टर सलीम का पालन-पोषण एक जीवंत संगीतमय परिवेश में हुआ। उनकी माता माथरो ने घर के वातावरण को सदैव कला के अनुकूल बनाए रखा, और उनके छोटे भाई परवेज पेजी ने भी आगे चलकर गायकी को ही अपना पेशा चुना।

मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने बठिंडा दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में लोक गीत 'चरखे दी घूक' प्रस्तुत किया। इस विस्मयकारी प्रदर्शन से प्रभावित होकर पंजाब के श्रोताओं ने उन्हें 'मास्टर' की उपाधि दी — एक नाम जो आज उनकी पहचान बन चुका है। इसके बाद 1990 में, 10 वर्ष की आयु में, उनका पहला आधिकारिक एल्बम 'चरखे दी घूक' सुर ताल लेबल के तहत जारी हुआ, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बाल कौतुक के रूप में स्थापित किया।

आवाज़ बदली, पर साधना नहीं टूटी

1990 के दशक के उत्तरार्ध में शारीरिक विकास के साथ मास्टर सलीम की आवाज़ में स्वाभाविक परिवर्तन आया। इस बदलाव के चलते उनकी तात्कालिक लोकप्रियता में भारी गिरावट आई और संगीत अनुबंध काफी कम हो गए। संगीत विश्लेषकों के अनुसार, यह संक्रमण काल किसी भी किशोर गायक के लिए मानसिक रूप से बेहद कठिन हो सकता है। परंतु सलीम ने इस दौर को अपनी साधना को गहरा करने के अवसर में बदल दिया।

वर्ष 2000 में दूरदर्शन के नववर्ष विशेष कार्यक्रम में उन्होंने सूफी गीत 'अज होना दीदार माही दा' के साथ नए स्वर में वापसी की। इसके बाद 2004 में मां दुर्गा को समर्पित भक्ति एल्बम 'मेला मैया दा' जारी किया, जिसने उनके करियर को एक नई दिशा और नई ऊर्जा दी।

बॉलीवुड में प्रवेश और शंकर महादेवन की भूमिका

जालंधर के ऐतिहासिक देवी तालाब मंदिर में एक माता के जागरण के दौरान मास्टर सलीम की भक्तिमय प्रस्तुति का सीधा प्रसारण एक धार्मिक टेलीविजन चैनल पर हो रहा था। मुंबई में इस प्रसारण को देख रहे प्रसिद्ध संगीतकार शंकर महादेवन उनकी आवाज़ की विस्तार-क्षमता और गायकी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत सलीम को मुंबई बुलाया। इसी मुलाकात ने उन्हें 2007 में फिल्म 'हे बेबी' के गीत 'मस्त कलंदर' के पार्श्वगायन का अवसर दिलाया।

इसके बाद 2008 में 'मां दा लाडला' और 2009 में 'आहुं आहुं' जैसे गीतों ने उन्हें बॉलीवुड में भी चार्टबस्टर गायक के रूप में स्थापित किया।

व्यक्तिगत जीवन और वर्तमान सफर

2014 में मास्टर सलीम ने अनमोल अलीशा सलीम से विवाह किया। 2021 में वे 'वॉयस ऑफ पंजाब सीजन 12' में मुख्य निर्णायक की भूमिका में नज़र आए। वर्तमान में वे नए गीतों और लाइव कॉन्सर्ट के ज़रिए सूफी और भक्ति संगीत की लौ को जीवंत रखे हुए हैं — यह साबित करते हुए कि सुरों की सच्ची साधना कभी थकती नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

मास्टर सलीम का सफर याद दिलाता है कि असली साधना में दशकों की मेहनत, आवाज़ टूटने का दर्द और पिता की डांट — सब शामिल होते हैं। गौरतलब है कि आवाज़ बदलने के संकट के बावजूद उन्होंने भक्ति और सूफी संगीत को थामे रखा, जो मुख्यधारा मनोरंजन उद्योग में दुर्लभ है। यही ज़मीन से जुड़ी साधना उन्हें भीड़ से अलग करती है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मास्टर सलीम कौन हैं और उनका असली नाम क्या है?
मास्टर सलीम का असली नाम सलीम शहजादा है। वे पंजाब के जालंधर जिले के शाहकोट में जन्मे सूफी, भक्ति और बॉलीवुड पार्श्वगायक हैं, जिन्हें 7 वर्ष की आयु में ही पंजाब के श्रोताओं ने 'मास्टर' की उपाधि दी थी।
मास्टर सलीम को संगीत की शिक्षा किसने दी?
उनके पिता और प्रख्यात सूफी गायक उस्ताद पूरन शाह कोटी ने मात्र 6 वर्ष की आयु से उन्हें शास्त्रीय और सूफियाना संगीत की तालीम देनी शुरू की। पिता के कड़े अनुशासन को मास्टर सलीम आज भी अपनी सबसे बड़ी सीख मानते हैं।
मास्टर सलीम बॉलीवुड में कैसे आए?
जालंधर के देवी तालाब मंदिर में एक जागरण का सीधा टेलीविजन प्रसारण देखकर संगीतकार शंकर महादेवन ने उन्हें मुंबई बुलाया और 2007 में फिल्म 'हे बेबी' के गीत 'मस्त कलंदर' के लिए पार्श्वगायन का अवसर दिया। इसके बाद 'मां दा लाडला' (2008) और 'आहुं आहुं' (2009) ने उन्हें बॉलीवुड में स्थापित किया।
मास्टर सलीम की आवाज़ बदलने के बाद उनके करियर पर क्या असर पड़ा?
1990 के दशक के उत्तरार्ध में किशोरावस्था में आवाज़ बदलने से उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आई और संगीत अनुबंध कम हो गए। परंतु उन्होंने इस कठिन दौर को साधना का माध्यम बनाया और वर्ष 2000 में दूरदर्शन के नववर्ष कार्यक्रम में नए स्वर के साथ सफल वापसी की।
मास्टर सलीम को 'मास्टर' की उपाधि कैसे मिली?
मात्र 7 वर्ष की आयु में बठिंडा दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में लोक गीत 'चरखे दी घूक' की अद्भुत प्रस्तुति से प्रभावित होकर पंजाब के श्रोताओं ने उन्हें 'मास्टर' की उपाधि दी, जो आज उनकी स्थायी पहचान बन चुकी है।
राष्ट्र प्रेस
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