महाराष्ट्र FDA ने सिप्ला के पुणे वेयरहाउस का लाइसेंस रद्द किया, पैकेजिंग-स्टोरेज में खामियाँ
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने 1 अक्टूबर 2026 को पुणे के वाडकी स्थित सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड के कैरीइंग एंड फॉरवर्डिंग (सीएंडएफ) वेयरहाउस के दवाओं की बिक्री और वितरण से संबंधित लाइसेंस रद्द कर दिए। एफडीए ने दवाओं की पैकेजिंग, स्टोरेज, स्टॉक प्रबंधन और दस्तावेज़ीकरण में कथित खामियों को आधार बनाकर यह कार्रवाई की है।
मुख्य घटनाक्रम
पुणे के डिवीजन-3 के सहायक आयुक्त (ड्रग्स) ने बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार मामले की पुनः समीक्षा के बाद यह आदेश जारी किया। इससे पहले 27 अगस्त को वेयरहाउस के खिलाफ प्रारंभिक कार्रवाई की गई थी, जिसे बाद में वापस लेकर संशोधित प्रक्रिया के तहत पुनर्विचार किया गया।
एफडीए ने 4 सितंबर को सिप्ला को संशोधित कारण बताओ नोटिस जारी किया। कंपनी ने 11 सितंबर को लिखित जवाब दिया और 21 सितंबर को व्यक्तिगत सुनवाई में भी अपना पक्ष प्रस्तुत किया। कंपनी के जवाब, रिकॉर्ड और संबंधित कानूनी प्रावधानों की जाँच के बाद लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने लाइसेंस रद्द करने का नया आदेश जारी किया।
पैकेजिंग पर आपत्तियाँ
एफडीए की जाँच में शेड्यूल-एच की प्रिस्क्रिप्शन दवा 'रिएक्टिन प्लस टैबलेट्स' की पैकेजिंग और प्रचार प्रमुख मुद्दों में रहे। एफडीए के अनुसार, दवा की पैकेजिंग पर इसे दर्द निवारक के रूप में प्रस्तुत किया गया था और सिरदर्द, मांसपेशियों के दर्द, कमर दर्द, जोड़ों के दर्द, मोच, शरीर के दर्द और दांत दर्द में राहत सहित कई उपयोग बताए गए थे, जिनकी कथित तौर पर अनुमति नहीं थी।
एफडीए ने पैकेजिंग पर मानव आकृति और मांसपेशियों के दर्द में राहत का संकेत देने वाले चित्रों के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई। गौरतलब है कि शेड्यूल-एच दवाओं के लिए ऐसे प्रचार-सामग्री और दावे दवा नियमों के तहत प्रतिबंधित हैं।
स्टोरेज और दस्तावेज़ीकरण की खामियाँ
पैकेजिंग के अलावा, एफडीए ने वेयरहाउस में दवाओं के भंडारण, रिकॉर्ड रखने और एक्सपायर हो चुकी दवाओं को संभालने की प्रक्रिया में भी कथित कमियाँ पाई। ये खामियाँ भारतीय दवा नियमों के तहत वेयरहाउस संचालन की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन मानी गई हैं।
एफडीए ने स्पष्ट किया कि यह आदेश पुनः की गई पूरी प्रक्रिया में सामने आए तथ्यों के आधार पर लिया गया है और यह केवल पूर्व कार्रवाई की पुनरावृत्ति नहीं है।
सरकार और नियामक की स्थिति
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय दवा नियामक निकाय देशभर में फार्मा वेयरहाउस और विनिर्माण इकाइयों पर निगरानी सख्त कर रहे हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट की सक्रिय भूमिका यह दर्शाती है कि न्यायपालिका भी दवा नियमन में सक्रिय रुचि ले रही है।
सिप्ला भारत की अग्रणी दवा कंपनियों में से एक है और इस कार्रवाई से कंपनी के पुणे स्थित वितरण नेटवर्क पर असर पड़ने की संभावना है। अभी तक कंपनी की ओर से इस ताज़ा आदेश पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आगे की राह
लाइसेंस रद्द होने के बाद सिप्ला के पास उच्च न्यायालय या उचित अपीलीय मंच में चुनौती देने का विकल्प उपलब्ध है। दवा उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी नियामक कार्रवाइयाँ अन्य फार्मा कंपनियों को भी अपने वेयरहाउस संचालन और पैकेजिंग अनुपालन की समीक्षा करने का संकेत देती हैं।