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लालगुडी जयरामन जयंती: 10 साल में अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने जाते थे, ऐसे रचा 'लालगुडी बानी' का इतिहास

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लालगुडी जयरामन जयंती: 10 साल में अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने जाते थे, ऐसे रचा 'लालगुडी बानी' का इतिहास

सारांश

10 साल की उम्र में अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने जाने वाला वह बच्चा आगे चलकर 'लालगुडी बानी' का जनक बना। लालगुडी जयरामन की जयंती पर उनकी उस संगीत-यात्रा की याद, जो बिना रेडियो के शुरू हुई और पद्म भूषण तक पहुँची।

मुख्य बातें

लालगुडी जयरामन का जन्म 17 सितंबर 1930 को तमिलनाडु के लालगुडी में एक संगीत परिवार में हुआ था।
बचपन में घर में रेडियो न होने के बावजूद संगीत की लगन ऐसी थी कि लगभग 10 साल की उम्र में अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने जाते थे।
उनकी विशिष्ट वायलिन शैली को ' लालगुडी बानी ' कहा जाता है, जिसमें वायलिन की धुन में गायकी का भाव होता था।
भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2001 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
2009 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और 2008 में म्यूजिक अकादमी, मद्रास का लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान मिला।
22 अप्रैल 2013 को 82 वर्ष की आयु में निधन; उनके पुत्र-पुत्री ने 'लालगुडी बानी' की परंपरा जारी रखी।

कर्नाटक संगीत के महान वायलिन वादक लालगुडी जयरामन की आज, 17 सितंबर 2026 को जयंती है। 17 सितंबर 1930 को जन्मे जयरामन ने वायलिन को एक साधारण वाद्य यंत्र से कहीं आगे ले जाकर उसमें गायकी का भाव भर दिया — और इसी अनूठी शैली को दुनिया ने 'लालगुडी बानी' के नाम से पहचाना। उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत उस दौर से हुई जब उनके घर में रेडियो भी नहीं था, फिर भी संगीत के प्रति ऐसी लगन थी कि करीब 10 साल की उम्र में वह अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने निकल पड़ते थे।

संगीत परिवार में जन्म, पिता ही बने गुरु

लालगुडी जयरामन का जन्म तमिलनाडु के लालगुडी क्षेत्र में एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसका कई पीढ़ियों से कर्नाटक संगीत से गहरा नाता था। उनके पिता लालगुडी वी.आर. गोपाला अय्यर स्वयं एक प्रतिष्ठित संगीतकार थे और उन्होंने बहुत छोटी उम्र से ही जयरामन को संगीत की विधिवत शिक्षा देनी शुरू कर दी। वायलिन धीरे-धीरे जयरामन की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन गया।

गाँव की शांत परिवेश ने उनके रियाज को और गहरा बनाया। कम शोर-शराबे के कारण वह घंटों वायलिन पर साधना कर सकते थे — एक ऐसी सुविधा जिसे उन्होंने खुद अपनी ट्रेनिंग के लिए बेशकीमती बताया था।

रेडियो नहीं था, पर संगीत की प्यास अथाह थी

एक इंटरव्यू में जयरामन ने बचपन को याद करते हुए बताया था कि उनके घर में रेडियो नहीं था। वह पड़ोसियों के घर जाकर या सार्वजनिक स्थानों पर लगे रेडियो पर ऑल इंडिया रेडियो के शाम के संगीत कार्यक्रम सुनते थे। जो भी सुनते, उसे स्मृति में संजोकर घर लौटते और देर रात तक वायलिन पर उसी धुन को उतारने की कोशिश करते।

उन्होंने बताया था कि अगर कोई कार्यक्रम रात करीब 9 बजे खत्म होता, तो वह तेज़ कदमों से घर लौटकर घंटों उन सुनी हुई रचनाओं को वायलिन पर दोहराते। संगीत के प्रति यह जुनून इतना प्रबल था कि लगभग 10 साल की उम्र में वह अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने तक निकल पड़ते थे।

बड़े गायकों के साथ मंच साझा किया

जयरामन ने बहुत कम उम्र में बड़े कलाकारों के साथ वायलिन बजाना शुरू कर दिया। उन्होंने मदुरै मणि अय्यर और जी.एन. बालासुब्रमण्यम जैसे दिग्गज गायकों के साथ संगत की। उन्होंने स्वयं कहा था कि बचपन में ध्यानपूर्वक सुनी गई रचनाओं ने उन्हें कलाकारों की गायकी और उनकी रचनाओं की भावना को समझने में बड़ी मदद दी।

यह सुनने और दोहराने का अनुशासन ही बाद में उनकी शैली की नींव बना — जहाँ वायलिन की हर तान में मानो शब्द और भाव एक साथ बोलते हों।

'लालगुडी बानी' और रचनात्मक विरासत

आगे चलकर उन्होंने वायलिन वादन की एक विशिष्ट शैली विकसित की, जिसे 'लालगुडी बानी' कहा गया। इस शैली की पहचान थी — राग, ताल और शब्दों के भाव को वायलिन की धुन में इस तरह पिरोना कि श्रोता को संगीत में एक पूरी कहानी महसूस हो।

जयरामन ने वर्णम, तिल्लाना सहित कई रचनाएँ तैयार कीं और 'सुलादी सप्त ताल रामायण' जैसी महत्त्वपूर्ण कृति भी उनके नाम है। उनके पुत्र लालगुडी जी.जे.आर. कृष्णन और पुत्री लालगुडी विजयलक्ष्मी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

सम्मान, संघर्ष और अंतिम वर्ष

भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2001 में पद्म भूषण से नवाज़ा। 1978 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2009 में अकादमी फेलोशिप प्रदान की गई। 2008 में म्यूजिक अकादमी, मद्रास ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान दिया।

2006 में स्ट्रोक के बाद उन्होंने मंच से दूरी बना ली, किंतु एक शिक्षक और संगीत-रचनाकार के रूप में सक्रिय रहे। 22 अप्रैल 2013 को 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी 'लालगुडी बानी' आज भी कर्नाटक संगीत की अमूल्य धरोहर है, और उनके शिष्य इसे जीवित रखे हुए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी कर्नाटक संगीत में ऐसी रचनात्मक गहराई का अभाव दिखता है — जो सुझाता है कि केवल पहुँच नहीं, वैसी साधना और गुरु-परंपरा भी ज़रूरी है जो जयरामन को विरासत में मिली थी।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लालगुडी जयरामन कौन थे?
लालगुडी जयरामन कर्नाटक संगीत के विश्वविख्यात वायलिन वादक और संगीतकार थे, जिनका जन्म 17 सितंबर 1930 को तमिलनाडु के लालगुडी में हुआ था। उन्होंने वायलिन वादन की एक विशिष्ट शैली 'लालगुडी बानी' विकसित की और पद्म भूषण सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किए।
'लालगुडी बानी' क्या है?
'लालगुडी बानी' लालगुडी जयरामन द्वारा विकसित वायलिन वादन की वह विशेष शैली है जिसमें राग, ताल और शब्दों के भाव को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वायलिन की धुन में गायकी जैसा अनुभव होता है। यह शैली आज भी कर्नाटक संगीत की एक महत्त्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है।
लालगुडी जयरामन को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उन्हें 1972 में पद्म श्री, 2001 में पद्म भूषण, 1978 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2009 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप प्रदान की गई। 2008 में म्यूजिक अकादमी, मद्रास ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान से भी नवाज़ा।
लालगुडी जयरामन के बचपन में संगीत सुनने की क्या चुनौतियाँ थीं?
उनके घर में रेडियो नहीं था, इसलिए वह पड़ोसियों के घर या सार्वजनिक स्थानों पर ऑल इंडिया रेडियो के संगीत कार्यक्रम सुनते थे। संगीत के प्रति इतनी लगन थी कि लगभग 10 साल की उम्र में वह अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने तक चले जाते थे।
लालगुडी जयरामन का निधन कब हुआ?
लालगुडी जयरामन का निधन 22 अप्रैल 2013 को 82 वर्ष की आयु में हुआ। 2006 में स्ट्रोक के बाद उन्होंने मंच-प्रदर्शन से दूरी बना ली थी, किंतु शिक्षक और संगीत-रचनाकार के रूप में सक्रिय रहे।
राष्ट्र प्रेस
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