क्या चार बजे की साधना और चार आने का इनाम एमएस गोपालकृष्णन की कहानी है, जिसे अमेरिका के वायलिन वादक ने भी सलाम किया?
Key Takeaways
- एमएस गोपालकृष्णन का संगीत में योगदान अद्वितीय रहा है।
- बचपन में सख्त अनुशासन ने उन्हें प्रेरित किया।
- उनकी संगीत यात्रा ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई।
- उन्होंने कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों में उत्कृष्टता प्राप्त की।
- उनकी साधना और मेहनत एक प्रेरणा है।
नई दिल्ली, 2 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल कलाकार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण परंपरा के प्रतिनिधि हैं। ऐसा ही एक नाम है एमएस गोपालकृष्णन, जिन्हें उनके प्रशंसक 'एमएसजी' कहकर जानते हैं। वे महानतम वायलिन वादकों में गिने जाते हैं और भारत में एकमात्र ऐसे कलाकार रहे हैं, जिन्होंने कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों शास्त्रीय संगीत में एकल कॉन्सर्ट प्रस्तुत किया।
10 जून 1931 को मद्रास (चेन्नई) में जन्मे एमएस गोपालकृष्णन के लिए संगीत केवल एक शौक नहीं था, बल्कि यह उनके खून में और परिवार में था, क्योंकि उनके पिता अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार और वायलिन वादक थे। यही कारण रहा कि एमएस गोपालकृष्णन को बचपन से ही इस कला में रुचि थी। उन्होंने दो वर्ष की उम्र में अपनी माँ को खो दिया, लेकिन उनके पिता ही उनके मार्गदर्शक और गुरु रहे।
एमएस गोपालकृष्णन ने 5 वर्ष की आयु से वायलिन सीखना प्रारंभ किया। मात्र 8 साल की उम्र में उन्होंने एक कॉन्सर्ट में अपना पहला लाइव परफॉर्मेंस दिया, जहाँ वे अपने पिता और भाई के साथ ऑल बंगाल म्यूजिक कॉन्फ़्रेंस में मंच पर उतरे।
एमएसजी की साधना की कथा उनके पिता के कठोर अनुशासन के बिना अधूरी है। पिता की सख्ती और गोपालकृष्णन की मेहनत ने उन्हें एक बेशकीमती रत्न बना दिया।
एमएस गोपालकृष्णन के शब्दों में, 'पिताजी बहुत सख्त शिक्षक थे। इसलिए हमें रोज़ आठ तबले बजाने होते थे। यानि, सुबह चार बजे उठना पड़ता था। स्कूल के दिनों में हम सुबह छह से आठ बजे तक वायलिन का अभ्यास करते थे। उस समय स्कूल सुबह 9:30 बजे शुरू होता था और 4:30 बजे खत्म होता था। स्कूल से लौटने के बाद फिर से शाम छह से नौ बजे तक अभ्यास करना पड़ता था। छुट्टियों में, शनिवार और रविवार को भी अभ्यास अनिवार्य था। अगर पिता कहीं बाहर जाते, तो हमें लगता था कि शायद आज छुट्टी मिलेगी, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता था।
इतनी सख्ती के बावजूद, बचपन में खुशी के पल भी थे। राग याद करने पर चार या आठ आने का इनाम मिलता था, जिससे चॉकलेट खरीदी जाती थी।
एमएस गोपालकृष्णन ने एक बार कहा, 'अगर हम अच्छा बजाते थे तो वे बहुत खुश होते थे। उस समय वे हमें इनाम के तौर पर चार आना या आठ आना देते थे। कभी-कभी वे कहते, 'अगर तुम राग याद करके सुना दोगे, तो चार आना दूंगा।' हम राग याद करके सुनाते और उन पैसों से चॉकलेट खरीदने जाते थे।' उन्होंने प्रसार भारती को दिए एक इंटरव्यू में अपने बचपन को याद किया।
पिता के साथ कार्यक्रमों में जाना जारी रहा। गोपालकृष्णन ने परफॉर्मेंस के लिए कई देशों का दौरा किया, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, हॉलैंड, सिंगापुर, मलेशिया और हांगकांग शामिल हैं। वह वायलिन बजाने के पश्चिमी तरीकों से भी परिचित थे।
'मैंने अपनी पूरी यात्रा में ऐसा वायलिन नहीं सुना। यह युवा भारतीय हमारा वाद्य यंत्र कितनी शानदार तरीके से बजा रहा है।' यह बात अमेरिकी वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन ने कही थी, जिन्हें बीसवीं सदी के महान वायलिन वादकों में से एक माना जाता है। उन्होंने 1952 में पहली बार एमएस गोपालकृष्णन को सुना था। येहुदी मेनुहिन उस समय मद्रास म्यूजिक कॉलेज आए थे।
गोपालकृष्णन को भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनकी उत्कृष्ट परफॉर्मेंस के लिए 2012 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें 1997 में मद्रास म्यूजिक एकेडमी का संगीत कलानिधि, पद्म श्री, कलईमामणि और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिले थे।
हालांकि, 3 जनवरी 2013 को यह आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। 81 वर्ष की उम्र में एमएस गोपालकृष्णन शास्त्रीय संगीत की विरासत छोड़कर इस संसार से विदा हो गए।