एल. सुब्रमण्यम: पिता के निधन के बाद एक साल तक नहीं छुआ वायलिन, पत्नी विजी की सलाह पर लिया यह बड़ा फैसला
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय शास्त्रीय संगीत के 'पगनिनी' कहे जाने वाले एल. सुब्रमण्यम का जीवन केवल संगीत की साधना नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय यात्रा भी है — जिसमें टूटने, संभलने और फिर से उठ खड़े होने की कहानी है। 23 जुलाई 1947 को मद्रास (अब चेन्नई) में जन्मे लक्ष्मी नारायण सुब्रमण्यम आज छह दशकों से अधिक के करियर के बाद भी विश्व के सर्वाधिक सम्मानित संगीतकारों में अग्रणी स्थान रखते हैं।
पिता थे पहले गुरु और सबसे बड़ी प्रेरणा
सुब्रमण्यम एक ऐसे परिवार में पले-बढ़े जहाँ संगीत जीवन का स्वाभाविक अंग था। उनके पिता प्रोफेसर वी. लक्ष्मी नारायण अपने युग के श्रेष्ठ वायलिन वादकों में गिने जाते थे। वे केवल पिता नहीं, बल्कि वह दीपक थे जिन्होंने बालक सुब्रमण्यम की असाधारण प्रतिभा को दिशा और आकार दिया।
एक इंटरव्यू में सुब्रमण्यम ने कहा था, 'बड़े सपने देखो, उन्हें पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करो और अपने काम के प्रति जुनूनी रहो। दृढ़ संकल्प और धैर्य आपको मंजिल तक पहुँचाते हैं। मैं अपने पिता की तरह बनना चाहता था। उनके जैसा गुरु मिलना एक आशीर्वाद है। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, और आज मैं जो कुछ भी हूँ, उन्हीं की बदौलत हूँ।'
पिता के निधन के बाद एक साल का मौन
पिता की मृत्यु ने सुब्रमण्यम को भीतर तक तोड़ दिया। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि इस गहरे दुख में उन्होंने लगभग एक वर्ष तक वायलिन को हाथ तक नहीं लगाया।
उनके शब्दों में, 'मेरे पिता ही मेरे गुरु थे। उनके गुजरने के बाद मैं इतना उदास और दुखी था कि मैंने लगभग एक साल तक वायलिन को हाथ तक नहीं लगाया। जब भी मैं उसे देखता, मुझे अपने पिता और उनकी धुनों की याद आ जाती। फिर मुझे उनका सपना याद आया — वायलिन को दुनिया के मंच तक ले जाना।'
यह ऐसे समय में आया जब सुब्रमण्यम संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके थे — फिर भी व्यक्तिगत क्षति ने उन्हें उस कला से दूर कर दिया जो उनकी पहचान थी।
पत्नी विजी की सलाह से लिया नया संकल्प
इस मौन को तोड़ने में उनकी पत्नी विजी की भूमिका निर्णायक रही। सुब्रमण्यम के अनुसार, 'मैंने अपनी पत्नी विजी के कहने पर ही उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए एक फेस्टिवल शुरू करने का फैसला किया था।' इस निर्णय ने न केवल उन्हें वायलिन की ओर वापस खींचा, बल्कि उनके पिता की विरासत को एक नया मंच भी दिया।
बाल प्रतिभा से विश्व मंच तक का सफर
सुब्रमण्यम ने मात्र 5 वर्ष की आयु में वायलिन सीखना आरंभ किया और 6 वर्ष की उम्र में अपना पहला कॉन्सर्ट प्रस्तुत किया। आगे चलकर उन्होंने कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट्स से पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 25 वर्ष की आयु में उन्हें प्रतिष्ठित 'वायलिन चक्रवर्ती' की उपाधि से विभूषित किया गया।
गौरतलब है कि वे उन विरले संगीतकारों में हैं जिन्होंने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत — दोनों परंपराओं में समान दक्षता हासिल की।
200 से अधिक रिकॉर्डिंग और वैश्विक उपस्थिति
छह दशकों से अधिक के करियर में सुब्रमण्यम ने 200 से अधिक रिकॉर्डिंग की हैं। भारतीय शास्त्रीय मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय ऑर्केस्ट्रा और विश्व संगीत समारोहों तक उनकी उपस्थिति रही है। उनके संगीत को 'सलाम बॉम्बे', 'मिसिसिपी मसाला' और 'लिटिल बुद्धा' जैसी चर्चित फिल्मों में भी स्थान मिला है। आज भी सुब्रमण्यम की साधना जारी है — और उनकी वायलिन की धुनें पिता के उस सपने को जीवित रखती हैं जो कभी एक बेटे ने अपनाया था।