शांति हीरानंद और बेगम अख्तर की गुरु-शिष्य परंपरा: एक अनोखी यात्रा
सारांश
Key Takeaways
- गुरु-शिष्य परंपरा संगीत में बेहद महत्वपूर्ण है।
- शांति हीरानंद और बेगम अख्तर का रिश्ता मां-बेटी जैसा था।
- संगीत में साधना और भाव की आवश्यकता होती है।
मुंबई, 9 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। संगीत के क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व होता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है पद्मश्री से सम्मानित शास्त्रीय गायिका शांति हीरानंद की, जो दिवंगत बेगम अख्तर की प्रमुख शिष्या रही हैं। शांति हीरानंद ने एक साक्षात्कार में बेगम अख्तर से अपनी पहली मुलाकात का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया।
10 अप्रैल को शांति हीरानंद की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उन्होंने बताया कि कैसे ‘कल आना’ कहकर शुरू हुई उनकी 25 वर्ष की गुरु-शिष्य यात्रा, बाद में मां-बेटी जैसे रिश्ते में बदल गई।
शांति हीरानंद का जन्म एक व्यापारिक परिवार में हुआ था। उनके परिवार में संगीत का कोई माहौल नहीं था। बचपन में उन्हें गली के बनिए से नारियल का गोला मंगवाने के बदले गाना पड़ता था। लोगों ने उनकी सुरीली आवाज़ देखकर उनके पिता को सलाह दी कि उन्हें संगीत सिखाया जाए। इसके बाद, उन्हें लखनऊ के संगीत कॉलेज में दाखिल कराया गया। लाहौर में रहने के दौरान, उन्होंने इंदिरा कोहली से शास्त्रीय संगीत की बुनियाद सीखी। विभाजन के बाद लखनऊ लौटने पर, उन्होंने उस्ताद ऐजाज हुसैन खां से भी शिक्षा प्राप्त की। लेकिन असली मोड़ तब आया जब आकाशवाणी लखनऊ के प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव जी.सी. अवस्थी ने उन्हें बेगम अख्तर से सीखने की सलाह दी।
शांति हीरानंद ने कहा, “मैं रिक्शे से उनके घर पहुंची। बेगम साहब सादी साड़ी में, बाल बंधे हुए और मुंह में सिगरेट लिए आईं। उन्होंने पूछा – तुम क्या गाती हो? मैंने मीरा का भजन ‘बसो मोरे नैनन में नंदलाल’ गाया। सुनकर उन्होंने कहा – तुम तो अच्छा गाती हो, कल आना।” और फिर वह ‘कल’ कभी खत्म नहीं हुआ, शांति जी ने मुस्कुराते हुए कहा। शुरू में वे केवल चाय पीकर लौट आती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनका मेरी जिंदगी पर गहरा प्रभाव पड़ने लगा। बेगम अख्तर ने उन्हें ठुमरी-खयाल सिखाए। समय के साथ, बेगम अख्तर का प्यार इतना बढ़ा कि वे उनके घर पर रहने लगीं। बेगम अख्तर उन्हें अपनी बेटी की तरह मानने लगीं। इसके बाद, गंडा बंधने की औपचारिक रस्म भी हुई। शांति हीरानंद ने अपनी किताब का नाम भी “बेगम अख्तर: द स्टोरी ऑफ माई अम्मी” रखा।
शांति जी ने बताया कि बेगम अख्तर बहुत मिलनसार थीं, लेकिन उनके साथ 25 साल का साथ सबसे लंबा था। बेगम अख्तर ने ही उनकी शादी भी तय की थी। शांति हीरानंद ने कहा कि गुरु के बिना संगीत सीखना बहुत कठिन है। गुरु ही सिखाते हैं कि बंदिश में भाव कैसे आए, मींड कैसे लगे और गाने में जान कैसे आए।
उन्होंने युवा गायिकाओं को सलाह देते हुए कहा था, “संगीत में साधना आवश्यक है। जल्दबाजी में नाम और पैसा मत देखो। रूह से गाना सीखो।”