सुखोई-30: ब्रह्मोस के लिए स्वदेशी तकनीक से सशक्त होगा भारतीय वायुसेना का प्रमुख विमान
सारांश
Key Takeaways
- सुखोई-30 भारतीय वायुसेना का मुख्य फाइटर जेट है।
- इसे स्वदेशी तकनीक से सशक्त किया जा रहा है।
- आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी उद्योगों की भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- सुपर सुखोई योजना के अंतर्गत विमान के एवियोनिक्स और रडार को अपग्रेड किया जाएगा।
- भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 में ब्रह्मोस मिसाइल को ले जाने की क्षमता है।
नई दिल्ली, 10 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। यदि भारतीय वायुसेना की ताकत और रीढ़ की हड्डी की बात की जाए, तो सुखोई-30 को इस श्रेणी में रखना गलत नहीं होगा। भारतीय वायुसेना के पास सबसे अधिक फाइटर जेट सुखोई ही हैं। पहले से ही शक्तिशाली इस विमान को और अधिक सक्षम बनाने के लिए वायुसेना अब इसे स्वदेशी तकनीक से सशक्त करने की दिशा में कार्यरत है।
भारतीय वायुसेना द्वारा तैयार किए गए कैपेबिलिटी रोडमैप में सुखोई को स्वदेशी ताकत देने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। इसके अंतर्गत एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलों के स्वदेशीकरण पर जोर दिया जा रहा है। वायुसेना इनकी खरीद की योजना में भी जुटी हुई है। कई स्वदेशी मिसाइलों को पहले ही शामिल किया गया है, और अब लॉन्चर से लेकर मिसाइल तक सब कुछ स्वदेशी बनाने की योजना बनाई जा रही है।
सुखोई-30 एमकेआई विमान को रूस से आवश्यक उपकरणों के साथ खरीदा गया था। इन उपकरणों की सहायता से मिशन के अनुसार विमान पर विभिन्न प्रकार के एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड हथियारों को लगाया जा सकता है। वर्तमान में विमान पर हथियार या अन्य उपकरण लगाने के लिए ओईएम द्वारा प्रदान किए गए लॉन्चर/एडेप्टर का उपयोग किया जाता है। ये लॉन्चर अपनी भार वहन क्षमता के कारण सीमित होते हैं और हर प्रकार के हथियार के लिए अलग-अलग लॉन्चर की आवश्यकता होती है।
वायुसेना के अनुसार, मिशन की आवश्यकताओं के अनुसार बार-बार लॉन्चर बदलने की जरूरत होती है, जिससे संचालन में विलंब होता है। इसी समस्या के समाधान के लिए अब एक सामान्य लॉन्चर विकसित करने की योजना बनाई जा रही है, जिससे विभिन्न प्रकार की मिसाइलों का उपयोग बिना लॉन्चर बदले किया जा सके।
दिलचस्प बात यह है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इस परियोजना में स्वदेशी उद्योगों की भागीदारी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। वायुसेना के रोडमैप में न केवल लॉन्चर को स्वदेशी रूप से विकसित करने का प्रावधान है, बल्कि एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलों के विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल भारत की अगली पीढ़ी की एयर-ड्रॉप प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन श्रृंखला का हिस्सा है। यह हथियार दूर से ही दुश्मन के महत्वपूर्ण स्ट्रैटेजिक ठिकानों को निशाना बनाकर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है।
आत्मनिर्भर योजना लागू होने के बाद इन मिसाइलों का देश में ही निर्माण होना आवश्यक हो गया है। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों को लॉन्च प्लेटफॉर्म बनाकर 50 से 500 किलोमीटर तक की विभिन्न रेंज के विकल्प विकसित किए जा सकते हैं। शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलों का भी देश में निर्माण जरूरी है।
सुखोई को ‘सुपर सुखोई’ बनाने की दिशा में पहले से ही प्रयास किए जा रहे हैं। इसके तहत 84 सुखोई विमानों के एवियोनिक्स, रडार और इंजन को अपग्रेड करने की योजना है। इसके अलावा 12 नए सुखोई विमानों की खरीद को भी मंजूरी दी जा चुकी है।
भारतीय वायुसेना ने रूस से कुल 272 सुखोई-30 की खरीद की है। इनमें से 50 रूस से बनकर आए थे और बाकी 222 फाइटर जेट साल 2000 से लाइसेंस प्रोडक्शन के तहत एचएएल के माध्यम से भारत में निर्मित किए जा रहे हैं। ऐसे में इस हैवी-वेट, लॉन्ग-रेंज फाइटर की संख्या बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि यह बड़ी मात्रा में बम और मिसाइलें ले जाने में सक्षम है। भारतीय वायुसेना का सुखोई-30 ही एकमात्र ऐसा फाइटर जेट है, जो ब्रह्मोस मिसाइल को ले जाने और दागने में सक्षम है।