गंगूबाई हंगल: 13 साल में शुरू हुई साधना, सात दशक तक किराना घराने की आवाज़ बनीं
सारांश
मुख्य बातें
गंगूबाई हंगल ने मात्र 13 वर्ष की आयु में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा आरंभ की और आगे चलकर किराना घराने की सर्वाधिक प्रतिष्ठित गायिकाओं में अपना नाम दर्ज कराया। 21 जुलाई 2009 को 96 वर्ष की आयु में उनके निधन के बाद भी भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका योगदान अमिट है — एक ऐसी विरासत जो सात दशकों की अथक साधना से बनी।
प्रारंभिक जीवन और संगीत की नींव
गंगूबाई हंगल का जन्म 5 मार्च 1913 को कर्नाटक के धारवाड़ में हुआ था। उनकी माँ अंबाबाई कर्नाटक संगीत की गायिका थीं, इसलिए घर का वातावरण शुरू से ही सुरों से सराबोर था। बालिका गंगूबाई की संगीत के प्रति स्वाभाविक रुचि को देखते हुए माँ ने उन्हें प्रारंभिक शिक्षा देनी शुरू की। यह वह बीज था जिसने आगे चलकर एक विशाल वृक्ष का रूप लिया।
संघर्ष और गुरु का मार्गदर्शन
उस युग में महिलाओं के लिए संगीत को व्यावसायिक रूप देना सामाजिक दृष्टि से अत्यंत कठिन था। कलाकारों को सम्मान अर्जित करने के लिए कड़े संघर्ष से गुज़रना पड़ता था। गंगूबाई ने इन बाधाओं को स्वीकार किया, परंतु अपनी साधना से कभी मुँह नहीं मोड़ा। 13 वर्ष की आयु में औपचारिक शिक्षा आरंभ करने के बाद उन्होंने कई गुरुओं से संगीत की बारीकियाँ सीखीं। इसके पश्चात उन्हें किराना घराने के महान संगीतज्ञ सवाई गंधर्व का सान्निध्य मिला, जिनके मार्गदर्शन ने उनकी गायकी को नई ऊँचाइयाँ दीं।
खयाल गायकी में अद्वितीय पहचान
गंगूबाई हंगल की विशिष्ट पहचान खयाल गायकी से बनी। अपने करियर के आरंभिक वर्षों में उन्होंने भजन, ठुमरी और शास्त्रीय संगीत की विविध विधाओं में प्रस्तुतियाँ दीं, किंतु कालांतर में उन्होंने स्वयं को पूर्णतः खयाल गायकी को समर्पित कर दिया। 1940 के दशक तक वे देश की अग्रणी शास्त्रीय गायिकाओं में गिनी जाने लगी थीं। ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से उनकी आवाज़ लाखों श्रोताओं तक पहुँची और उन्होंने देशभर के मंचों पर अपनी प्रस्तुतियाँ दीं।
शिक्षण और सामाजिक योगदान
गंगूबाई ने लगभग सात दशकों तक संगीत की निरंतर सेवा की। मंच पर प्रस्तुति देने के साथ-साथ उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को भी तराशा। वे कर्नाटक विश्वविद्यालय में मानद संगीत प्राध्यापक के पद पर भी रहीं। 2006 में अपने संगीत जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने पर उन्होंने अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। निधन के पश्चात उन्होंने नेत्रदान कर अंगदान के प्रति जागरूकता का भी संदेश दिया।
पुरस्कार और सम्मान
भारतीय शास्त्रीय संगीत में अतुलनीय योगदान के लिए गंगूबाई हंगल को अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। 1971 में उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। 1973 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 1996 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप — जो इस संस्था का सर्वोच्च सम्मान है। 2002 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाज़ा गया। उनकी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के संगीतकारों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।