नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ 'नकाब': श्रुति देशपांडे ने बताया शिकागो का वो यादगार थिएटर किस्सा
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री श्रुति देशपांडे ने थिएटर नाटक 'नकाब' में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ मंच साझा किया और इस अनुभव को उन्होंने अपने करियर के सबसे सीखने वाले पलों में से एक बताया। मुंबई में हुई एक बातचीत में श्रुति ने खुलासा किया कि नवाजुद्दीन अपने हर प्रदर्शन में एक अनूठापन लेकर आते हैं जो उन्हें बाकी कलाकारों से अलग करता है।
नवाजुद्दीन की कला: हर बार कुछ नया
श्रुति देशपांडे ने नवाजुद्दीन की अभिनय-शैली की तारीफ करते हुए कहा, "नवाजुद्दीन उम्दा किस्म के कलाकार हैं, उनके काम में आपको एक नयापन देखने को मिलेगा। वह जो भी करते हैं, उसमें कुछ नया और अलग लेकर आते हैं।" यह टिप्पणी केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक अनुभवी थिएटर कलाकार का पेशेवर मूल्यांकन है।
शिकागो में तकनीकी संकट और मंच पर संयम
शिकागो में 'नकाब' के एक शो के दौरान एक अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो गई। श्रुति ने बताया कि थिएटर में तकनीकी खराबी के कारण नवाजुद्दीन का माइक्रोफोन अचानक बंद हो गया, जिससे दर्शक चिल्लाने लगे कि उन्हें आवाज़ सुनाई नहीं दे रही।
उन्होंने कहा, "जब आप लाइव परफॉर्म कर रहे हों और दर्शक चिल्ला रहे हों कि आवाज नहीं आ रही, तो बहुत ज्यादा ध्यान भटकता है। नवाज को अपनी आवाज तेज करनी पड़ी और जोर से बोलना पड़ा। एक एक्टर एक हद तक ही तेज आवाज में बोल सकता है, इसलिए हमने भी उनका साथ दिया और अपनी आवाज को उसी हिसाब से एडजस्ट किया।"
श्रुति ने संभाला मोर्चा: थिएटर अनुभव काम आया
श्रुति ने बताया कि चूँकि 'नकाब' नवाजुद्दीन का पहला थिएटर अनुभव था और वे स्वयं वर्षों से मंच पर काम कर रही थीं, इसलिए उन्होंने उस नाज़ुक पल में ज़िम्मेदारी अपने हाथ में ली। उन्होंने थोड़ा इम्प्रोवाइज़ किया और माइक ठीक होने तक उस छोटे से ब्रेक को सहजता से संभाल लिया।
उन्होंने कहा, "आखिर में उन्हें अपना माइक ठीक करवाने के लिए बैकस्टेज जाना पड़ा। मुझे लगा कि उस वक्त मुझे जिम्मेदारी लेनी चाहिए। मैंने थोड़ा इम्प्रोवाइज किया और हमने उस टेक्निकल खराबी और छोटे से ब्रेक को संभाल लिया, फिर शो आगे बढ़ाया।"
स्क्रीन और थिएटर का फर्क: सबसे बड़ी सीख
श्रुति देशपांडे ने इस पूरे अनुभव से एक गहरी सीख निकाली — थिएटर और स्क्रीन अभिनय में बुनियादी अंतर यही है कि मंच पर रीटेक की कोई गुंजाइश नहीं होती। उन्होंने कहा, "आपको टेक्निकल प्रॉब्लम, ऑडियंस और परफॉर्मेंस को बिना यह दिखाए मैनेज करना होता है कि कुछ गड़बड़ हुई है। मुझे लगता है कि उनसे मेरी सबसे बड़ी सीख यही थी।"
यह किस्सा न केवल दो प्रतिभाशाली कलाकारों की पेशेवर समझ को दर्शाता है, बल्कि थिएटर की उस अनिश्चितता को भी उजागर करता है जो इसे सिनेमा से सर्वथा अलग और चुनौतीपूर्ण बनाती है।