सारिका का सफ़र: 5 साल की उम्र में सेट पर कदम, दो राष्ट्रीय पुरस्कारों तक का संघर्ष
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा की अनुभवी अभिनेत्री सारिका का बचपन किताबों और खेल के मैदान की जगह फिल्मों के सेट पर बीता। महज पाँच साल की उम्र में उन्होंने परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली, और यही संघर्ष आगे चलकर उनकी पहचान बना। बाल कलाकार से शुरू हुआ यह सफ़र दो राष्ट्रीय पुरस्कारों तक पहुँचा — एक अभिनय के लिए और दूसरा कॉस्ट्यूम डिज़ाइन के लिए।
दिल्ली में जन्म और बचपन का संघर्ष
सारिका का जन्म 3 जून 1960 को नई दिल्ली में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता परिवार से अलग हो गए, जिसके बाद घर चलाने का बोझ नन्ही सारिका पर आ गया। परिवार की मदद के लिए उन्होंने फिल्मों में काम शुरू किया, और इसी वजह से स्कूली शिक्षा का अवसर उन्हें नहीं मिल सका।
अपने एक पुराने साक्षात्कार में सारिका ने बताया था कि उन्होंने जीवन से ही सबसे बड़ी सीख ली और मेहनत को अपना सबसे बड़ा सहारा बनाया।
बाल कलाकार से मुख्य अभिनेत्री तक
शुरुआती दौर में सारिका ने कई फिल्मों में लड़के के किरदार निभाए। बड़े होने पर उन्हें फिल्म 'गीत गाता चल' से बतौर मुख्य अभिनेत्री खास पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने 'आशीर्वाद', 'छोटी बहू', 'जिद', 'वंदना', 'गृह प्रवेश' और 'खुशबू' जैसी कई चर्चित फिल्मों में काम किया। अपनी सहज और सादगी भरी अदाकारी के कारण वह दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहीं।
कमल हासन से रिश्ता और निजी जीवन
सारिका का नाम दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता कमल हासन के साथ जुड़ा। दोनों लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे और बाद में 1988 में शादी की। उनकी बड़ी बेटी श्रुति हासन, जो आज फिल्म जगत का जाना-पहचाना नाम हैं, का जन्म शादी से पहले हुआ था; उसके बाद छोटी बेटी अक्षरा हासन का जन्म हुआ। यह दंपति 2004 में अलग हो गया।
पर्दे के पीछे की प्रतिभा और राष्ट्रीय पुरस्कार
अभिनय के अलावा सारिका ने कॉस्ट्यूम डिज़ाइन के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी। कमल हासन की चर्चित फिल्म 'हे राम' के लिए उनके कॉस्ट्यूम डिज़ाइन को व्यापक सराहना मिली और उन्हें सर्वश्रेष्ठ कॉस्ट्यूम डिज़ाइन का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।
इसके कुछ वर्षों बाद फिल्म 'परजानिया' में उनके दमदार अभिनय ने आलोचकों और दर्शकों का ध्यान खींचा। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला — दोनों ओर का यह दुर्लभ सम्मान भारतीय सिनेमा में बहुत कम कलाकारों के नाम है। आज भी सारिका उन अभिनेत्रियों में शुमार हैं जिन्होंने ग्लैमर से ज़्यादा अभिनय की गहराई को तरजीह दी।