शबाना आजमी ने शेयर की 1955 की दुर्लभ बचपन की तस्वीर, दिव्या दत्ता बोलीं — 'कितनी प्यारी शरारती बच्ची'
सारांश
मुख्य बातें
वरिष्ठ अभिनेत्री शबाना आजमी ने 18 मई 2025 को इंस्टाग्राम पर अपनी एक दुर्लभ बचपन की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर साझा की, जो 1955 की है और रेड फ्लैग हॉल में बिताए दिनों की याद दिलाती है। यह तस्वीर उन्हें मशहूर उर्दू लेखक सज्जाद जहीर की पोती ने भेजी थी।
तस्वीर में क्या है
पोस्ट की गई ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर में शबाना आजमी बच्चों के एक समूह के साथ बैठी नज़र आ रही हैं। तस्वीर में सभी बच्चे कैमरे की ओर देखते हुए मुस्कुरा रहे हैं — एक ऐसी झलक जो दशकों पुरानी स्मृतियों को जीवंत कर देती है।
अभिनेत्री ने कैप्शन में लिखा, 'यह तस्वीर मुझे कल सज्जाद जहीर की पोती ने भेजी। यह 1955 की तस्वीर है, जो रेड फ्लैग हॉल में हमारे साथ बिताए गए दिनों की याद दिलाती है।'
साहित्यिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
सज्जाद जहीर भारत के प्रमुख उर्दू साहित्यकारों में से एक थे और प्रगतिशील लेखक संघ तथा इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) के संस्थापकों में उनकी गिनती होती है। शबाना आजमी के पिता, विख्यात शायर कैफी आजमी, सज्जाद जहीर के विचारों से गहरे प्रभावित थे और उनके करीबी सहयोगी भी रहे।
सज्जाद जहीर की पुत्री नादिरा बब्बर एक जानी-मानी रंगमंच हस्ती और अभिनेत्री हैं। शबाना आजमी और नादिरा बब्बर के परिवारों के बीच यह साहित्यिक और सांस्कृतिक रिश्ता दशकों पुराना है — और यह तस्वीर उसी साझे इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया
इस पोस्ट को प्रशंसकों का भरपूर प्यार मिल रहा है। अभिनेत्री दिया मिर्जा ने हार्ट इमोजी के साथ प्रतिक्रिया दी, जबकि अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने कमेंट में लिखा, 'ये शरारती बच्ची कितनी प्यारी है।' फिल्म जगत और साहित्य प्रेमियों दोनों ने इस पोस्ट को सराहा है।
आगामी फिल्म 'लाहौर 1947'
पर्दे पर शबाना आजमी जल्द ही निर्देशक राजकुमार संतोषी की बहुप्रतीक्षित एक्शन ड्रामा फिल्म 'लाहौर 1947' में नज़र आएंगी। आमिर खान के प्रोडक्शन हाउस द्वारा निर्मित इस फिल्म में सनी देओल, प्रीति जिंटा, अली फज़ल और करण देओल प्रमुख भूमिकाओं में हैं।
यह फिल्म प्रसिद्ध नाटककार असगर वजाहत के चर्चित नाटक 'जिस लाहौर नईं वेख्या ओ जम्याइ नी' पर आधारित है — भारत-विभाजन के दर्द को बयाँ करती एक संवेदनशील और भावनात्मक कहानी। यह फिल्म शबाना आजमी की उस विरासत को और मज़बूत करती है जो साहित्य, संस्कृति और सिनेमा के संगम पर खड़ी है।