जन्मदिन विशेष: सुखविंदर सिंह — अमृतसर से ऑस्कर तक, 'छैय्या छैय्या' से 'जय हो' तक का सफर
सारांश
मुख्य बातें
गायक सुखविंदर सिंह का जन्म 18 जुलाई 1971 को अमृतसर के एक सिख परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि बचपन में जब वे स्कूल का होमवर्क पूरा नहीं करते थे, तो उनके शिक्षक उन्हें डाँटने के बजाय गाना सुनाने को कहते थे — इतनी असाधारण थी उनकी आवाज़। उस बच्चे को तब शायद ख़ुद भी अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन यही आवाज़ ऑस्कर (एकेडमी अवार्ड्स) के वैश्विक मंच पर भारत का परिचय बनेगी।
बचपन से मंच तक: असाधारण शुरुआत
महज़ 8 साल की उम्र में सुखविंदर ने पहली बार मंच पर कदम रखा और 1970 की फिल्म 'अभिनेत्री' का गीत 'सा रे गा मा पा' गाकर श्रोताओं को चकित कर दिया। उनकी प्रतिभा यहीं नहीं रुकी — 13 साल की उम्र में उन्होंने प्रसिद्ध गायक मलकीत सिंह के लिए सदाबहार भांगड़ा गीत 'तूतक तूतक तूतिया' की धुन तैयार की, जो आज भी लोक संगीत की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।
किशोरावस्था में उन्होंने गुरु प्रोफेसर बी.एस. नारंग से शास्त्रीय संगीत का विधिवत प्रशिक्षण लिया। इसके बाद मुंबई आकर उन्होंने प्रख्यात संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ 'म्यूज़िक अरेंजर' के रूप में काम किया।
विश्व भ्रमण और संगीत का विस्तार
मुंबई की चकाचौंध छोड़कर सुखविंदर कुछ समय के लिए इंग्लैंड और अमेरिका के दौरे पर निकल गए। वहाँ उन्होंने वैश्विक संगीत की विभिन्न विधाओं को सुना, समझा और आत्मसात किया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ — इस अनुभव ने उनकी आवाज़ में सूफी और लोक संगीत का एक अनूठा मिश्रण घोल दिया।
'छैय्या छैय्या' और एआर रहमान के साथ ऐतिहासिक साझेदारी
भारत लौटने के बाद सुखविंदर दक्षिण भारत गए, जहाँ उनकी मुलाकात ए.आर. रहमान से हुई। सुखविंदर ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्होंने 'थैया थैया' नाम की एक धुन बनाई थी। रहमान ने उस धुन की व्यापक संभावनाओं को पहचाना, उसे तकनीकी रूप से तराशा और गीतकार गुलज़ार ने बुल्ले शाह की सूफी कविता से प्रेरणा लेकर इसके बोल लिखे। इस तरह 1998 की फिल्म 'दिल से' का कल्ट क्लासिक गीत 'छैय्या छैय्या' अस्तित्व में आया — भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर।
पुरस्कारों की यात्रा: फिल्मफेयर से ऑस्कर तक
1998 में 'छैय्या छैय्या' के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक पुरस्कार मिला। 2007 में 'चक दे! इंडिया' का शीर्षक गीत भारतीय खेलों का अनौपचारिक राष्ट्रगान बन गया। 2008 में 'हौले हौले' (रब ने बना दी जोड़ी) को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उसी वर्ष 'जय हो' (स्लमडॉग मिलियनेयर) ने ऑस्कर और ग्रैमी — दोनों प्रतिष्ठित सम्मान अर्जित किए, जिससे भारत की आवाज़ वैश्विक मंच पर गूंजी। 2014 में 'बिस्मिल' (हैदर) के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाज़ा गया।
आज भी सक्रिय: डिजिटल युग में खाँटी आवाज़
डिजिटल युग में जब 'ऑटो-ट्यून' का चलन आम हो गया है, सुखविंदर सिंह मंच पर प्रदर्शन के दौरान इसका सहारा नहीं लेते। वे आज भी फिल्मों के लिए पार्श्व गायन कर रहे हैं और लाइव कॉन्सर्ट में सक्रिय हैं। हाल ही में उन्होंने 'शतक', 'बॉर्डर 2' और 'ओ रोमियो' जैसी फिल्मों के लिए गाने गाए हैं। 18 जुलाई 2025 को 54 वर्ष के होने वाले सुखविंदर सिंह का सफर इस बात का प्रमाण है कि सच्ची प्रतिभा न सीमाओं को मानती है, न दौर को।